साल 2025 अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए बुरी तस्वीर लेकर आया है। इस साल वहां की अब तक 446 बड़ी कंपनियाँ दिवालिया हो चुकी हैं। कॉरपोरेट बैंकरप्सी यानी दिवालियेपन का यह आँकड़ा 2010 के बाद सबसे तेज़ रफ्तार पर है। जनवरी से जून के बीच ही 371 बड़ी कंपनियों को दिवालिया घोषित कर दिया गया और अकेले जुलाई में 71 बड़ी कंपनियाँ ध्वस्त हो चुकी हैं। कुल मिलाकर साल की पहली छमाही ही निवेशकों और कर्मचारियों के लिए किसी बुरे सपने जैसी बीती है।
याद दिलाना ज़रूरी है कि covid महामारी के बाद 2022 में दिवालियेपन की दर सबसे नीचे पहुँच गई थी। लेकिन उसके बाद से हर तिमाही यह संख्या लगातार बढ़ रही है। और अब 2025 में यह सिलसिला तेज़ी से ऊपर चढ़ता दिख रहा है।
डोनाल्ड ट्रम्प ने जनवरी 2025 में अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी। सत्ता संभालते ही उन्होंने अपने पसंदीदा हथियार टैरिफ़ के जरिए दूसरे देशों पर ज़ोर आजमाइश करके दबाव बनाने का प्रयास किया। ट्रम्प का दावा था कि ऊँचे टैरिफ़ लगाकर वे अमेरिकी उद्योगों की रक्षा करेंगे, ख़ज़ाना भरेंगे और जनता को “Buy American” के नारे से जोड़ देंगे।
पर हक़ीक़त? अगस्त तक अमेरिका की औसत टैरिफ़ दर 18.6% पर पहुँच गई, जो 1933 के बाद सबसे ऊँची है। भारत से आने वाले सामानों पर तो ट्रम्प प्रशासन ने 50% तक टैरिफ़ थोप दिया। सुनने में तो लगता है जैसे “Make America Great Again” की गूँज है, लेकिन बाज़ार की हकीकत में यह कदम कई कंपनियों के लिए मौत का पैग़ाम साबित हो रहा है।
टैरिफ़ के नाम पर जो ‘अर्थशास्त्र का जादू’ दिखाने की कोशिश हुई, उसने असल में आम अमेरिकियों की जेब काट डाली। नई टैरिफ़ नीतियों ने कुल मिलाकर महँगाई को 1.8% तक ऊपर धकेल दिया। एक औसत अमेरिकी परिवार को साल भर में \$2400–\$2700 अतिरिक्त चुकाना पड़ रहा है। गाड़ियाँ 12% महँगी, जूते 39% महँगे, कपड़े 37% और मेटल के उत्पाद तो पूरे 41% उछल गए। अब अगर अमेरिकी परिवार बाहर डिनर की बजाय घर पर टोस्ट खाकर बैठ जाएँ, तो किसी को हैरानी नहीं होगी।
सबसे ग़रीब 10% अमेरिकी परिवारों की कमाई का हिस्सा सबसे ज़्यादा कटा है। अमीरों के लिए ये बस “एक और टैक्स” जैसा है, लेकिन गरीबों के लिए यह सीधा पेट पर लात है। इसके अलावा तमाम इंडिपेंडेंट रिपोर्टों के मुताबिक, इन टैरिफ़ का असर 2025 की GDP वृद्धि को 0.5 प्रतिशत अंक तक नीचे खींच देगा। साल के अंत तक बेरोज़गारी दर में 0.3% की वृद्धि और रोज़गार में 5 लाख नौकरियों की कटौती का अनुमान है। कुछ उद्योगों को थोड़ी ऑक्सीजन मिली है, लेकिन कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्र गहरी सांसें ले रहे हैं।
बढ़ती कीमतें और वैश्विक सप्लाई चेन में खलल ने अमेरिकी कंपनियों को दो तरफ़ा झटका दिया। कच्चा माल महँगा, उपभोक्ता की जेब खाली। ऐसे में कंपनियों का बैलेंस शीट सँभालना मुश्किल हो गया। दूसरी ओर, ब्याज दरें ऊँची और उपभोक्ताओं पर कर्ज़ का पहाड़ पहले से ही लदा हुआ था। नतीजा, बड़ी कंपनियाँ तो धराशायी हो ही रही हैं, आम अमेरिकियों ने भी अदालतों का रुख़ किया है। 2025 की पहली छमाही में व्यक्तिगत दिवालियेपन में 15% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यानी जब उपभोक्ता ही टूटने लगें, तो कंपनियों का टूटा जाना स्वाभाविक है।
कुल मिलाकर ट्रम्प की टैरिफ़ नीति का इरादा चाहे जो रहा हो, उसका असर साफ़ दिख रहा है…महँगाई की मार, उपभोक्ताओं की जेब खाली और कंपनियों का बढ़ता दिवालियापन।
2024 चुनाव के समय जब अमेरिका की सड़कों पर “Bring back jobs, bring back prosperity” जैसे नारे गूंज रहे थे तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक साल के अंदर – अंदर हालात कुछ ऐसे होंगे कि लोगों को मज़ाक में कहना पड़े, “Trump promised to make America great, but ended up making America late… on its debt payments.” नतीजा यह कि “America First” की नीति धीरे-धीरे “Bankruptcy First” की ओर बढ़ती दिख रही है। और इतिहास के पन्नों में यह दर्ज हो रहा है कि कभी-कभी टैरिफ़ की ऊँची दीवारें अर्थव्यवस्था की नींव को ही हिला देती हैं।
