नई दिल्ली। बिहार चुनाव से ठीक पहले आई रिपोर्ट बता रही है कि चुनावी वादे पर इतना पैसा बहाया गया है कि राज्यों का कर्जा आसमान छूने लगा है। सबसे ज्यादा खर्च महाराष्ट्र में हुआ, जहां लाडक़ी बहिन योजना सहित दूसरी रेवड़ी बांटी गई। 23 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। बीते दो साल में आठ राज्यों में 67 हजार 928 करोड़ रुपये खर्चे गए हैं। बिहार चुनाव में करीब 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह रकम आय से होने वाली कमाई का साढ़े सात फीसद बताई जा रही है। मध्यप्रदेश में भी मोहन सरकार बनने से पहले हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
मध्यप्रदेश की लाड़ली योजना
चुनावी वादा पूरा करने के लिए मध्यप्रदेश में खजाने का दस फीसद से ज्यादा खर्च कर दिया गया। भाजपा की सत्ता वापसी से पहले एंटी इनकम्बेंसी जोर पकड़ रही थी, लेकिन लाड़ली बहना योजना गेम चैंजर साबित हुई और भाजपा को फिर सत्ता मिल गई। एक हजार रुपये महीने से शुरू हुआ खर्चा साढ़े बारह सौ रुपये पहुंच गया है। इसे तीन हजार रुपये तक ले जाने का वादा हो रहा है। मध्यप्रदेश में आरोप लगता है कि इस एक योजना के कारण दूसरी योजनाओं का पैसा रोक दिया गया है। केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत करीब ग्यारह हजार करोड़ रुपये भी मध्यप्रदेश का रुका हुआ है।
हरियाणा में सबसे कम पैसा खर्च
हरियाणा में सबसे कम पैसा खर्च किया गया। वहां सिर्फ खजाने का 0.41 फीसद पैसा बांटा गया। झारखंड में इंडिया गठबंधन की सरकार बनी है। जेएमएम अगुवाई कर रही है। वहां खजाने का सोलह फीसद खर्च किया गया। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी यही हाल है। राजस्थान में भजनलाल सरकार से पहले गेहलोत सरकार ने भी खूब पैसा बहाया था। ओडि़सा में नवीन पटनायक ने 2 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए, फिर भी सरकार नहीं बचा सके। तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और दिल्ली में भी चुनावी वादे ने राज्यों को कर्जे में ला दिया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट यह भी बता रही है कि चुनाव के छह-आठ महीने पहले ही इन योजनाओं का ऐलान हुआ। वोट भी खींसे में आ गए, लेकिन सरकार बनने के बाद वादा निभाना मजबूरी हो गया और प्रदेश पर बोझ बढ़ता गया।
