भारत और अफगानिस्तान के तालिबान शासित सरकार के बीच बढ़ती नज़दीकी दक्षिण एशिया की राजनीति में एक अहम और जटिल मोड़ है। अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताक़ी की भारत यात्रा जो 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद पहली बार हुई है, ने पूरे क्षेत्र के कूटनीतिक संतुलन को हिला दिया है। यह मुलाकात न केवल भारत-अफगान रिश्तों का नया अध्याय खोलती है, बल्कि पाकिस्तान और अमेरिका जैसे देशों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।
भारत और अफगानिस्तान के संबंध सदियों पुराने हैं। सांस्कृतिक, व्यापारिक और राजनीतिक रिश्तों की एक गहरी परंपरा रही है। अफगानिस्तान के राजशाही काल और बाद के गणराज्य काल में भारत को एक विश्वसनीय मित्र के रूप में देखा जाता था।
1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के बाद भारत ने सोवियत समर्थित सरकार का समर्थन किया और राष्ट्रपति नजीबुल्लाह के शासनकाल तक राजनयिक संबंध बनाए रखे। लेकिन 1990 के दशक में जब तालिबान का उदय हुआ तो भारत ने इसका कड़ा विरोध किया।
भारत ने 1996 से 2001 तक तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी और नॉर्दर्न अलायंस का समर्थन किया। तालिबान के दौर में महिलाओं और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, बामियान बुद्ध प्रतिमाओं का विनाश, और हिंदू समुदाय पर भेदभाव जैसे मुद्दों ने भारत के विरोध को और मजबूत किया।
2001 में अमेरिका के नेतृत्व वाले हमले के बाद जब तालिबान सत्ता से हटा, तब भारत ने अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण का कार्यभार संभाला। भारत ने सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों से लेकर संसद भवन तक के निर्माण में सहयोग दिया। लेकिन 2021 में तालिबान की पुनर्वापसी के बाद भारत ने अपना दूतावास बंद कर दिया और कूटनीतिक उपस्थिति सीमित कर दी।
कल मुत्तकी ने भारत और अफगानिस्तान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्तों का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत को करीबी दोस्त बताया, जो मुश्किल वक्त में अफगानिस्तान के साथ खड़ा रहा।
हाल ही में हेरात प्रांत में आए भूकंप के बाद भारत ने सबसे पहले मानवीय मदद भेजी थी। उन्होंने कहा- भारत ने सबसे पहले मदद की। हम भारत को करीबी दोस्त मानते हैं।
मुत्तकी ने भारत को अफगानिस्तान के खनिज और एनर्जी सेक्टर में इन्वेस्टमेंट करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के संसाधनों का रास्ता तालिबान से होकर जाता है और वे भारत के साथ काम करना चाहते हैं।
भारत फिर शुरू करेगा अफगानिस्तान में अपना दूतावास
जयशंकर ने कहा कि भारत को अफगानिस्तान के विकास में गहरी रुचि है। उन्होंने आतंकवाद से निपटने के लिए जारी साझा कोशिशों की भी तारीफ की।
उन्होंने मुत्तकी से कहा कि हम भारत की सुरक्षा के प्रति आपकी संवेदनशीलता की सराहना करते हैं। पहलगाम आतंकी हमले के दौरान आपने जो समर्थन दिया, वह तारीफ के काबिल था।
जयशंकर ने कहा,’भारत, अफगानिस्तान की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और स्वतंत्रता के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसे और मजबूत करने के लिए ही, मैं आज भारत के तकनीकी मिशन को भारतीय दूतावास के दर्जे तक बढ़ाने की घोषणा कर रहा हूं।’
तालिबान से भारत की मौजूदा नज़दीकी क्यों पेचीदा है?
अब भारत का तालिबान के साथ संपर्क बढ़ाना एक रणनीतिक लेकिन जोखिम भरा कदम है। भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, परंतु संवाद के द्वार खोल दिए हैं।
भारत की मंशा कई स्तरों पर देखी जा सकती है, जैसे – सुरक्षा हित: भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल भारत-विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए हो। तालिबान ने भारत को इस दिशा में आश्वासन दिया है। दूसरा कारण, पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान का समर्थनकर्ता रहा है। भारत अब उसी खेल के मैदान में प्रवेश कर पाकिस्तान के प्रभाव को कम करना चाहता है। तीसरा कारण अफगानिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में अहम है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत का तालिबान से संवाद आवश्यक बन गया है।
तालिबान के लिए भी भारत के साथ संबंध लाभकारी हैं। भारत से आर्थिक सहायता, निवेश और अंतरराष्ट्रीय वैधता मिलने की संभावना उन्हें पाकिस्तान पर निर्भरता से थोड़ा मुक्त कर सकती है।
अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताक़ी के भारत आने से पाकिस्तान सबसे ज़्यादा असहज है। उसने दशकों तक तालिबान को “रणनीतिक गहराई” के रूप में देखा था, ताकि भारत के विरुद्ध एक बफर ज़ोन बना रहे। लेकिन अब तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण हैं…सीमा विवाद, आतंकी हमले और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की गतिविधियों के कारण। भारत-तालिबान नज़दीकी पाकिस्तान की इस रणनीतिक संपत्ति को कमज़ोर कर रही है।
पाकिस्तान के अलावा अमेरिका भी चिंतित है। उसने तालिबान पर प्रतिबंध लगा रखे हैं और चाहता है कि कोई देश उन्हें वैधता न दे। भारत का बढ़ता संपर्क वाशिंगटन के लिए चिंता का कारण है क्योंकि इससे तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में बल मिल सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले महीने कहा था कि वे अफगानिस्तान में अमेरिका का बनाया हुआ बगराम एयरबेस वापस चाहते हैं। अगर ऐसा नहीं किया गया तो गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। इसके जवाब में मुत्तकी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि ‘बगराम एयरबेस किसी को नहीं देंगे। उन्होंने ये भी कहा कि अफगानिस्तान अपनी जमीन का इस्तेमाल किसी देश के खिलाफ नहीं होने देगा।’ मुत्तकी ने आगे कहा कि ‘अफगान लोग कभी अपनी जमीन पर विदेशी सेना को स्वीकार नहीं करेंगे। अगर कोई देश अफगानिस्तान के साथ संबंध बनाना चाहता है, तो डिप्लोमेटिक तरीके से आए, मिलिट्री वर्दी में नहीं।’
अमेरिका और पाकिस्तान क्यों डरे हुए हैं?
भारत के अफगानिस्तान में सक्रिय होने से पाकिस्तान को डर है कि काबुल में उसका प्रभाव समाप्त हो सकता है और भारत उसकी सीमाओं पर रणनीतिक बढ़त हासिल कर सकता है।
वाशिंगटन को डर है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश द्वारा तालिबान के साथ संवाद करने से वैश्विक स्तर पर उन्हें वैधता मिल सकती है, जिससे अफगानिस्तान फिर से चरमपंथ का गढ़ बन सकता है।
भारत – तालिबान रिश्ता क्यूँ है टेढ़ी खीर
भारत और तालिबान दोनों के लिए यह रिश्ता जोखिम और अवसर का मिश्रण है। जहाँ भारत को अल्पकालिक सुरक्षा लाभ मिल सकते हैं, परंतु लंबे समय में यह उसके लोकतांत्रिक चरित्र और छवि को प्रभावित कर सकता है। इसकी एक झलक मुत्ताक़ी की प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को शामिल न करने और दोनों देशों के झंडों को न फहराने से नज़र भी आ चुकी है।
वहीं अफगानिस्तान के लिए यह आर्थिक राहत और पाकिस्तान से स्वतंत्र नीति अपनाने का मौका बन सकता है। दक्षिण एशिया के लिए, यह एक नई शीत युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जिसमें भारत और पाकिस्तान अफगानिस्तान की ज़मीन पर फिर से अप्रत्यक्ष संघर्ष में उतर सकते हैं।
भारत-तालिबान संबंधों का यह नया अध्याय एक व्यावहारिक कूटनीति का प्रतीक है, लेकिन इसके भीतर कई विस्फोटक संभावनाएँ छिपी हैं। मुत्ताक़ी की भारत यात्रा इतिहास की एक बड़ी घटना है, जो आने वाले वर्षों में दक्षिण एशिया के राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित करेगी। यह रिश्ता भरोसे से अधिक संदेह और रणनीति पर आधारित है। और शायद यही इसकी सबसे बड़ी जटिलता है।
