भारत के बाघ सिर्फ जंगलों के राजा नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी विरासत हैं जिनकी जड़ें लगभग 10 हजार साल पीछे मध्य Chinaसे जुड़ी हुई हैं। शोध बताते हैं कि भारतीय बाघों के पूर्वज चीन के जंगलों से धीरे-धीरे दक्षिण की ओर बढ़ते हुए भारत आए और यहां की जलवायु, भूगोल और जैव विविधता ने उन्हें फलने-फूलने का अनुकूल वातावरण दिया।
18 नवंबर 1972 भारत के इतिहास का वह दिन है, जब देश ने आधिकारिक रूप से रॉयल बंगाल टाइगर को अपना राष्ट्रीय पशु घोषित किया। इससे पहले शेर भारत का नैशनल एनिमल था, लेकिन उसकी मौजूदगी सिर्फ गुजरात के गिर जंगल तक सीमित थी। इसके विपरीत, बाघ देश के अधिकांश हिस्सों में पाए जाते थे । हिमालयी तराई से लेकर मध्य भारत के घने जंगलों तक।
बाघों का महत्व केवल जैविक नहीं, सांस्कृतिक भी है। पौराणिक कथाओं में भी बाघ शक्ति और साहस का प्रतीक रहा है। हिंदू धर्म में देवी दुर्गा को प्रायः बाघ पर विराजमान दिखाया जाता है, जो इसकी आध्यात्मिक महत्ता को भी दर्शाता है।
1972 में बाघों की संख्या गिरकर 1000 से भी कम रह गई थी, जबकि 1900 में इनकी संख्या 40,000 से ज्यादा बताई जाती है। यही गिरावट ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ लॉन्च करने की सबसे बड़ी वजह बनी। इसका लक्ष्य था बाघों की रक्षा, उनके आवासों का संरक्षण और अवैध शिकार पर रोक लगाना।
आज स्थिति पहले से कहीं बेहतर है। भारत में 3000 से अधिक बाघ मौजूद हैं। मध्य प्रदेश 780+ बाघों के साथ देश का टाइगर स्टेट कहलाता है। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कुल बाघों में से 75% सिर्फ भारत में पाए जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां बाघ सुरक्षित रहते हैं, वहां के जंगल भी स्वस्थ रहते हैं और स्वस्थ जंगल ही पर्यावरण के भविष्य को सुरक्षित रखते हैं।
