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Reading: चुनाव आयोग ने जारी किया भारी भरकम डेटा, पारदर्शिता, स्टडी और विश्लेषण के लिए खजाना बनेगा
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Election Commission Preview - The Fourth
India

चुनाव आयोग ने जारी किया भारी भरकम डेटा, पारदर्शिता, स्टडी और विश्लेषण के लिए खजाना बनेगा

भारत के विपरित कई विकसित देशों में अभी भी चुनाव में बेलट पेपर का उपयोग होता है, जो समय और संसाधन के लिहाज से कम प्रभावी है।

Last updated: दिसम्बर 27, 2024 2:51 अपराह्न
By Rajneesh 1 वर्ष पहले
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11 Min Read
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भारतीय चुनाव प्रणाली को दुनिया की सबसे व्यापक और प्रभावी लोकतांत्रिक प्रणालियों में से एक माना जाता है। जहां अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य कई देशों में चुनाव प्रणाली सीमित या जटिल हो सकती है, भारत में यह प्रणाली व्यापक रूप से किसी को भी अलग नहीं छोड़ती। उदाहरण के लिए, भारत में 18 वर्ष से ऊपर के हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार है, जबकि अमेरिका जैसे देशों में वोटर पंजीकरण की जटिल प्रक्रिया कई नागरिकों को मतदान से वंचित कर देती है। इसके अलावा, भारत ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल जैसी उन्नत तकनीकों को अपनाया है, जो मतदान प्रक्रिया को न केवल तेज़ और सुरक्षित बनाती हैं, बल्कि किसी भी गड़बड़ी की संभावना को लगभग समाप्त कर देती हैं।

इसके विपरीत, कई विकसित देशों में अभी भी बेलट पेपर का उपयोग होता है, जो समय और संसाधन दोनों की दृष्टि से कम प्रभावी है। भारतीय चुनाव आयोग, जो पूरी तरह से स्वतंत्र है, दुनिया के सबसे कुशल और निष्पक्ष चुनावी प्राधिकरणों में से एक है। इसकी तुलना में, कई देशों में चुनाव प्रक्रिया पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते रहते हैं। साथ ही, भारत में चुनाव प्रक्रिया का पैमाना सोच से भी बड़ा है। करीब 1 अरब मतदाताओं के साथ इतनी विशाल और जटिल प्रक्रिया को शांतिपूर्ण और कुशलता से संपन्न करना, किसी अन्य देश की चुनाव प्रणाली के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।

बीते दिनों जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान के दिन से पांच दिन से अधिक समय तक पर्दा नहीं उठा था तो एक बहस शुरू हो गई। इस बहस की अहम वजह थी वहां की मतगणना की प्रक्रिया का बहुत लंबा होना। इस प्रक्रिया में, दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र सवालों के केंद्र में आ गया और बहुत से लोगों का कहना था कि अमेरिका को भारत से सीखना चाहिए।

हालांकि खुद भारत में भी चुनावों को लेकर हारने वाला विपक्ष रोते नहीं थकता और तरह तरह के आरोप भी लगाता है। इलेक्शन कमिशन का पक्ष लेने वाले तबके को भी उनसे शिकायत रहती थी कि वो जानकारी छुपाते हैं। लेकिन हाल ही में इलेक्शन कमिशन ने एक बेहतरीन कदम उठाया है। उन्होंने 2024 के लोकसभा और 4 राज्यों के विधानसभा चुनावों की विस्तृत रिपोर्ट जारी की हैं। डेटा में मतदाताओं, मतदान केंद्रों, वोट प्रतिशत, पार्टी-वार वोट शेयर और लिंग के आधार पर मतदान पैटर्न जैसी कई जानकारियां शामिल हैं, जिससे रिसर्च और चुनावी विश्लेषण में पारदर्शिता मिलेंगी।

10 पॉइंट्स में इस रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया गया है। पहले बिंदु के अनुसार 2024 में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या बढ़कर 97.97 करोड़ हो गई। यह 2019 के 91.19 करोड़ के आंकड़े से 7.43% ज़्यादा है। कुल 64.64 करोड़ वोट पड़े, जो 2019 के 61.4 करोड़ से अधिक हैं। इनमें से 64.21 करोड़ EVM वोट थे (32.93 करोड़ पुरुष, 31.27 करोड़ महिलाएं और 13,058 थर्ड जेंडर) और 42.81 लाख पोस्टल बैलेट से वोट डाले गए।

2024 के लोकसभा चुनाव में 10,52,664 पोलिंग स्टेशन थे। यह संख्या 2019 के 10,37,848 से ज्यादा है। सिर्फ 40 पोलिंग स्टेशन पर दोबारा मतदान हुआ। यह कुल का सिर्फ 0.0038% है। 2019 में 540 जगहों पर दोबारा मतदान हुआ था, इससे काफी कम। हर पोलिंग स्टेशन पर औसतन 931 मतदाता थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में पोलिंग स्टेशन की संख्या बढ़ी। री-पोलिंग बहुत कम हुई। 2019 के मुकाबले 2024 में काफी कम जगहों पर दोबारा वोटिंग करानी पड़ी। हर पोलिंग स्टेशन पर औसतन 931 लोगों ने वोट डाले।

2019 के मुकाबले, इस बार लोकसभा चुनाव में मतदान का आंकड़ा अलग-अलग रहा। असम के धुबरी में सबसे ज्यादा 92.3% वोट पड़े। जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में सबसे कम 38.7% मतदान हुआ, जो 2019 के 14.4% से काफी बेहतर है। 11 सीटों पर 50% से कम मतदान हुआ। NOTA को 63.71 लाख वोट (0.99%) मिले, जो 2019 के 1.06% से कम है। ट्रांसजेंडर वोटर्स ने 27.09% मतदान किया। धुबरी और श्रीनगर के मतदान प्रतिशत में जमीन-आसमान का फर्क साफ दिखा। कई जगहों पर कम वोटिंग चिंता का विषय है। NOTA का कम इस्तेमाल, लोगों की भागीदारी को दर्शाता है। ट्रांसजेंडर वोटर्स ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 1,62,069 पोलिंग स्टेशन थे। लक्षद्वीप में सबसे कम 55 पोलिंग स्टेशन थे। 11 संसदीय क्षेत्रों में 1,000 से कम पोलिंग स्टेशन थे। तीन संसदीय क्षेत्रों में 3,000 से ज्यादा पोलिंग स्टेशन थे। बिहार में 2019 के मुकाबले 4,739 पोलिंग स्टेशन ज्यादा बनाए गए। पश्चिम बंगाल में 1,731 पोलिंग स्टेशन ज्यादा बने। यूपी में सबसे ज्यादा पोलिंग स्टेशन होने का मतलब है कि वहां वोट देने वालों की संख्या काफी ज्यादा है। लक्षद्वीप में कम पोलिंग स्टेशन होने का मतलब वहां आबादी कम है। बिहार में पोलिंग स्टेशन बढ़ने से पता चलता है कि वहां मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।

2024 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी। पंजीकृत मतदाताओं की कुल संख्या 97.97 करोड़ थी। इनमें से 47.63 करोड़ महिला मतदाता थीं। 2019 में यह संख्या 43.85 करोड़ थी। कुल मतदाताओं में महिलाओं का प्रतिशत 2019 के 48.09% से बढ़कर 48.62% हो गया। पुडुचेरी में सबसे ज्यादा 53.03% महिला मतदाता थीं। केरल 51.56% के साथ दूसरे स्थान पर रहा। प्रति 1,000 पुरुषों पर महिला मतदाताओं का अनुपात 946 हो गया, जो 2019 में 926 था। यह एक नया रिकॉर्ड है। महिला मतदाताओं की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। पुडुचेरी और केरल में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक रही। यह दर्शाता है कि इन राज्यों में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला है। बढ़ता हुआ महिला-पुरुष मतदाता अनुपात भी सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

लोकसभा चुनाव में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 65.78% रहा, जो पुरुषों (65.55%) से ज्यादा था। 2019 के बाद यह दूसरा मौका है जब महिला मतदाताओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ा। असम के धुबरी में सबसे ज़्यादा 92.17% महिलाओं ने वोट डाले। पश्चिम बंगाल के तामलुक में 87.57% महिलाओं ने मतदान किया। इस बार 800 महिला उम्मीदवार मैदान में थीं, जबकि 2019 में यह संख्या 726 थी। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 111 महिला उम्मीदवार थीं। उसके बाद उत्तर प्रदेश में 80 और तमिलनाडु में 77 महिला उम्मीदवार चुनाव लड़ीं। हालांकि, 152 सीटों पर एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी।

2024 के लोकसभा चुनाव में 12,459 नामांकन दाखिल हुए। यह संख्या 2019 के 11,692 नामांकनों से थोड़ी ज्यादा है। नाम वापस लेने और रद्द होने के बाद, 8,360 उम्मीदवार चुनाव मैदान में बचे। 2019 में यह संख्या 8,054 थी। इस बार ज्यादा लोगों ने चुनाव लड़ने के लिए पर्चा भरा। लेकिन चुनाव लड़ने वालों की संख्या में भी थोड़ा सा ही इजाफा हुआ।

सबसे अधिक नामांकन वाला संसदीय क्षेत्र तेलंगाना में मल्काजगिरी था, जहां 114 नामांकन हुए थे, जबकि असम में डिब्रूगढ़ में सबसे कम, केवल तीन नामांकन दर्ज किए गए थे।

2024 के लोकसभा चुनावों में थर्ड जेंडर वोटर्स की संख्या में अच्छी बढ़ोतरी देखी गई। 2019 के 39,075 से बढ़कर 2024 में इनकी संख्या 48,324 हो गई। यह 23.5% की बढ़ोतरी है। दिव्यांग मतदाताओं की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ, 2019 के 61.67 लाख से बढ़कर 2024 में 90.28 लाख हो गई। विदेशी मतदाताओं की संख्या भी बढ़कर 1,19,374 हो गई, जिसमें 1,06,411 पुरुष, 12,950 महिलाएं और 13 थर्ड जेंडर वोटर्स शामिल हैं। 2019 में यह संख्या 99,844 थी। थर्ड जेंडर मतदाताओं की सबसे ज्यादा संख्या तमिलनाडु (8,467) में दर्ज की गई। ट्रांसजेंडर लोगों में मतदान प्रतिशत लगभग दोगुना हो गया, 2019 के 14.64% की तुलना में 2024 में यह 27.09% तक पहुंच गया। यह दिखाता है कि ज्यादा लोग अपने मतदान के अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं।

6 राष्ट्रीय पार्टियों ने कुल वैध वोटों का 63.35% हासिल किया। स्वतंत्र उम्मीदवारों में से सिर्फ 7 जीते, जबकि 3,905 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। स्वतंत्र उम्मीदवारों को कुल वैध वोटों का 2.79% मिला। कुल 7,190 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई, जो 2019 के मुकाबले ज़्यादा है। सूरत (गुजरात) एकमात्र ऐसा संसदीय क्षेत्र रहा जहां निर्विरोध चुनाव हुआ। स्वतंत्र उम्मीदवारों में 279 महिलाएं थीं। कुल 3,921 स्वतंत्र उम्मीदवार चुनाव में खड़े हुए थे।

इतना बड़ा डेटासेट जारी करके चुनाव आयोग ने पारदर्शिता की ओर एक बड़ा कदम उठाया है। ये डेटासेट चुनावों को समझने और उनका विश्लेषण करने के लिए एक खजाना साबित होगा। इससे न सिर्फ शोधकर्ताओं को, बल्कि आम जनता को भी फायदा होगा। वे चुनाव प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे और लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अपना योगदान दे पाएंगे। इस डेटासेट के जरिए चुनाव आयोग ने एक मिसाल कायम की है।

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