क्या पैसा भावनाओं को खरीद सकता है? शायद नहीं…लेकिन आज हम ऐसा किस्सा सुनाने जा रहे हैं जिसमें मानवता का एक सुन्दर उदाहरण शामिल है, उदाहरण कि अगर पैसे को समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो यह उन लोगों के लिए राहत, सम्मान और उम्मीद खरीद सकता है जो लंबे समय से उससे वंचित रहे हों।
सूरत के एक कपड़ा व्यवसायी बाबूभाई जीरावाला ने अमरेली ज़िले के जीरा गाँव के 290 किसानों के सदियों पुराने फर्जी कर्जों को चुकाने के लिए ₹90 लाख का दान देकर मानवता और उदारता की एक उल्लेखनीय मिसाल कायम की है।
अपनी दिवंगत मां की पुण्यतिथि पर किए गए इस भावनात्मक कृत्य ने ग्रामीणों के लिए निराशा के आंसुओं को खुशी के आंसुओं में बदल दिया – जिससे स्मरण का दिन मुक्ति और कृतज्ञता के दिन में बदल गया।

जो काम सरकारें नहीं कर पातीं, वो एक व्यक्ती ने अपने बल बूते कर दिखाया
रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने गांव के 290 किसानों का लगभग 90 लाख रुपये का कर्ज चुक्ता कर दिया। यानी पूरे गांव को कर्जमुक्त कर दिया।
1995 से ही गांव की सेवा सहकारी मंडली से जुड़ा एक ऋण विवाद चल रहा था। समिति के पुराने प्रशासकों ने किसानों के नाम पर फर्जी लोन ले लिए थे। नतीजा ये हुआ कि विवाद की वजह से किसान पिछले तीन दशकों से सरकारी योजनाओं और नए कर्जों से वंचित थे। बैंक ने गांव के किसी भी किसान को नया लोन देना बंद कर दिया था, जिससे खेती-किसानी बुरी तरह प्रभावित थी।
यह पहली बार नहीं है जब जीरावाला परिवार ने व्यक्तिगत स्मृति को सामुदायिक सेवा में बदला है। बाबूभाई ने बताया, “इससे पहले, मेरे पिता की पुण्यतिथि पर, हमने सामाजिक कल्याण कार्यक्रम आयोजित किए थे। इस बार, हमने एक वास्तविक बदलाव लाने का फैसला किया – पीढ़ियों से चली आ रही पीड़ा को मिटाने का।”
भावुक हुए गांववाले
उन्होंने अपने भाई के साथ बैंक अधिकारियों से मुलाकात की और कुल 89 लाख 89 हजार 209 रुपये का बकाया कर्ज चुकाकर सभी किसानों के लिए ‘नो ड्यू सर्टिफिकेट’ ले लिए। जब ये सर्टिफिकेट गांव के सभी 290 किसानों को सौंपे गए, तो माहौल बेहद भावुक हो गया। किसानों की आंखों में खुशी के आंसू थे, मानो वर्षों का बोझ उतर गया हो। सभी ने बाबूभाई को आशीर्वाद दिया और कहा कि उन्होंने गांव को नया जीवन दिया है।
