अपराधों को रोकना और कानून का पालन कराना पुलिस का मुख्य कर्तव्य है, लेकिन जब पुलिसकर्मी ही कानून का उल्लंघन करते हैं तो जनता के विश्वास पर सवाल खड़ा हो जाता है। मध्य प्रदेश में हाल ही में विभिन्न मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन मामलों में लूट, छेड़छाड़, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और जनता की आस्था को ठेस पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के विधायक बाला बच्चन द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने बताया कि पिछले दो वर्षों में राज्य में पुलिसकर्मियों के खिलाफ कुल 329 एफआइआर दर्ज हुई हैं। इनमें से 259 मामलों में आरोप पत्र पुलिस ने ही अदालतों में दायर किए हैं। यह दर्शाता है कि राज्य में पुलिस अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने में सक्रिय रही है।
इसके अलावा 61 मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच अभी चल रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन मामलों को गंभीरता से ले रहा है। सात मामलों में अदालत ने एफआइआर को रद्द कर दिया जबकि दो मामलों में अदालत ने पुलिस के आदेशों पर रोक लगा दी है। ये आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि कानून के पालन में किसी को भी छूट नहीं दी जा रही है। पुलिस को न केवल अपराधियों के खिलाफ बल्कि अपने कर्मचारियों के कर्तव्यों के प्रति जवाबदेह भी रहना पड़ता है। इस प्रकार की पारदर्शिता और जवाबदेही जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है।
मध्य प्रदेश में पुलिस के खिलाफ दर्ज हुई इन एफआइआर का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून के साथ न्याय हमेशा बराबरी पर हो और कोई भी अपने पद का दुरुपयोग करके जनता की सुरक्षा और विश्वास को खतरे में न डाले।
