हाल ही में SCO मीटिंग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहलगाम में हुए कायराना नरसंहार का जिक्र करते हुए आतंकवाद का मुद्दा फिर उठाया। आज 5 September है यानी म्यूनिख नरसंहार की दुखद सालगिरह।
5/09 /1972 – म्यूनिख ओलिंपिक का खेल गांव। यहां हो रहे थे ओलंपिक खेल। जर्मनी चाहता था कि पूरी दुनिया को दिखाए कि वह नाजी अतीत से निकलकर अब एक नए, शांतिप्रिय देश के रूप में खड़ा है। सुबह के पाँच बज रहे थे। ओलंपिक गांव अब भी सोया हुआ था। हवा में ठंडक थी, लेकिन खेलों का उत्साह चारों तरफ फैला था। कोई खिलाड़ी प्रैक्टिस पर जाने को तैयार हो रहा था की तैयारी कर रहा था, कोई नींद में डूबा हुआ था। सभी देशों के रंग बिरंगे झंडे हवा में लहरा रहे थे। लेकिन अचानक ट्रैकसूट पहने 8 फिलिस्तीनी आतंकवादी ओलिंपिक विलेज के भीतर घुसे। उनके कंधों पर भारी हथियार थे, आंखों में सिर्फ एक लक्ष्य। दुनिया को आतंक की शक्ति दिखाना। यह ब्लैक सितंबर संगठन के आतंकी थे।
कुछ ही देर में इस्राइली कमरों से गोलियों की आवाज गूंजी। इजरायल के कैंप में मौजूद कुश्ती के कोच मोशे वेनबर्ग और वेटलिफ्टर योसेफ रोमानो ने बंदुकधारियों को रोकने का प्रयास किया। हाथापाई के दौरान आतंकवादियों ने दोनों की गोली मारकर हत्या कर दी। बाकी नौ बंधक बना लिए गए।
टेलीविज़न चैनलों पर कैमरे लग गए। यह पहली बार था जब किसी आतंकवादी घटना का लाइव प्रसारण विश्व के तमाम देशों में हो रहा था। लाखों आंखें स्क्रीन पर जमी थीं। आतंकियों की मांग साफ थी, उनके साथी कैदियों की रिहाई। वो 236 कैदियों की रिहाई की मांग कर रहे थे। इसमें 234 कैदी इजरायल की जेलों में बंद थे।
जर्मन पुलिस ने बात करने की कोशिश की। पर आतंकियों की आंखों में सिर्फ जिद थी। आतंकवादियों ने बंधकों को चारा बनाकर कैंप की बिल्डिंग से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए विमान की मांग की। शाम होते-होते तय हुआ कि उन्हें और होस्टेज खिलाडियों को फुरस्टेनफेल्डब्रुक हवाई अड्डे ले जाया जाएगा।
यहां कमांडों और अतंकवादियों के बीच गोलीबारी हुई है, जिसमें पांच आतंकवादी मार गिराये गये लेकिन जैसे ही बाकी 3 आतंकियों को एहसास हुआ कि वो भी फंस जायेंगे, उन्होंने सभी नौ इस्राइली खिलाड़ियों की हत्या कर दी और भाग निकले। हालांकि कुछ समय बाद उन्हें पकड़ लिया गया।
म्यूनिख का वह दिन सिर्फ एक नरसंहार नहीं था, वह इतिहास का ऐसा घाव बन गया जो आज तक भरा नहीं। इस्राइल की सुरक्षा एजेंसी ‘मोसाद’ ने बाद में उन जिम्मेदारों को खत्म करने के लिए ‘Operation Wrath of God” चलाकर लगभग 20 साल तक म्यूनिख हमले के दोषियों को ढूंढ-ढूंढकर मारा
जर्मनी ने सालों बाद माफी मांगी। पर जिन परिवारों ने अपने बेटे खो दिए थे, उनकी आंखों से आंसू कभी सूखे नहीं। हर दिन जब ये तारिख आती है तो आतंकवाद के दिए वो घाव फिर ताज़ा हो जाते हैं।
