धर्म और आस्था की नगरी सीहोर उस समय विशेष आध्यात्मिक उत्साह का केंद्र बन गई, जब कुबेरेश्वर धाम में आयोजित शिव महापुराण कथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का आगमन हुआ। मंच पर पहुंचते ही “जय श्री राम” और “हर-हर महादेव” के जयघोष से पूरा परिसर गूंज उठा। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने उनका स्वागत किया और वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
यह आयोजन Pradeep Mishra का “कर्जा उतारने” कुबेरश्वर धाम पहुँचे बागेश्वर सरकार के सान्निध्य में चल रही शिव महापुराण कथा के बीच हुआ, जो मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही थी।
“कर्ज उतार दिया” बयान का संदर्भ
मंच से संबोधित करते हुए धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा कि उन्होंने “महाराज जी का कर्ज उतार दिया है।” उनका इशारा Pandit Pradeep Mishra की ओर था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि “महाराज जी बागेश्वर धाम आए थे, अब हम यहां आ गए हैं। हम किसी का कर्ज उधार नहीं रखते, आज हिसाब बराबर हो गया।”
उनके इस वक्तव्य को श्रोताओं ने हल्के-फुल्के और स्नेहपूर्ण संदर्भ में लिया। पंडाल तालियों और जयघोष से गूंज उठा। शास्त्री ने यह भी स्पष्ट किया कि Pandit Pradeep Mishra उनसे वरिष्ठ हैं और वे उनका सम्मान करते हैं। उन्होंने संत परंपरा की मर्यादा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आपसी प्रेम और सम्मान का संबंध है, न कि किसी प्रकार की प्रतिस्पर्धा।
संत परंपरा और आपसी सौहार्द का संदेश
धीरेंद्र शास्त्री और Pradeep Mishra दोनों ही अपने-अपने धार्मिक आयोजनों और कथाओं के माध्यम से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। एक ओर बागेश्वर धाम की कथा और दरबार चर्चाओं में रहते हैं, तो दूसरी ओर कुबेरेश्वर धाम में शिव महापुराण कथा और रुद्राभिषेक जैसे आयोजन बड़ी संख्या में भक्तों को जोड़ते हैं।
सीहोर में यह पहली बार था जब बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पहुंचे। इस मौके को कई श्रद्धालुओं ने ऐतिहासिक बताया। मंच से उन्होंने यह भी कहा कि “वह डबरा से आए हैं तो अब हम डबरा जा रहे हैं,” जिससे वातावरण में सहज हंसी और अपनापन देखने को मिला।
कुबेरेश्वर धाम की बढ़ती पहचान
सीहोर स्थित कुबेरेश्वर धाम पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक आयोजनों का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां आयोजित शिव महापुराण कथाओं में लाखों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते रहे हैं। प्रदेश और देश के कई हिस्सों से भक्त यहां पहुंचते हैं। प्रशासन को भी ऐसे आयोजनों के दौरान विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है।
धार्मिक आयोजनों के माध्यम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है। होटल, परिवहन और छोटे व्यापारियों को इससे लाभ होता है। सीहोर की पहचान अब केवल एक जिला मुख्यालय तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में भी उभर रही है।
भीड़ और व्यवस्थाओं की चुनौती
इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी प्रशासन के लिए चुनौती भी होती है। सुरक्षा, यातायात और स्वास्थ्य सेवाओं की विशेष व्यवस्था की जाती है। आयोजन के दौरान पुलिस और प्रशासनिक अमला सक्रिय रहा, ताकि किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।
धार्मिक आयोजनों का सामाजिक प्रभाव
ऐसे आयोजनों का सामाजिक प्रभाव भी व्यापक होता है। जहां एक ओर यह लोगों की आस्था और आध्यात्मिक जुड़ाव को मजबूत करते हैं, वहीं दूसरी ओर समाज में एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को भी सुदृढ़ करते हैं। संतों के मंच से दिए गए संदेशों का असर बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचता है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान को भी अधिकांश श्रद्धालुओं ने सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण संदेश के रूप में लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह “कर्ज” केवल प्रेम और सम्मान का प्रतीक है।
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