विक्रम संवत 2082 का अंतिम महीना फाल्गुन इस वर्ष धार्मिक आस्था, रंगोत्सव और सांस्कृतिक उल्लास का विशेष संगम लेकर आ रहा है। हर पल मस्ती और हर दिन उत्सव की भावना से सराबोर यह महीना दो फरवरी से आरंभ होकर तीन मार्च तक चलेगा। इस बार फाल्गुन माह पूरे 30 दिनों का होगा, जिसमें सनातन धर्मावलंबी कुल 26 व्रत और पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाएंगे। रंग, अबीर, गुलाल, भंग की तरंग और गुझिया की मिठास के साथ यह माह वर्ष के सबसे आनंदमय समय के रूप में जाना जाएगा।
फाल्गुन माह को शिव-शक्ति के मिलन और वासंतिक उल्लास का प्रतीक माना जाता है। इसी माह भगवान शिव और आदिशक्ति पार्वती के विवाह का पर्व महाशिवरात्रि मनाया जाता है। इस वर्ष महाशिवरात्रि 15 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। देशभर के शिवालयों में इस अवसर पर विशेष पूजा, रुद्राभिषेक और जागरण का आयोजन होगा। काशी, उज्जैन, केदारनाथ और अन्य प्रमुख तीर्थस्थलों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ेगी।
फाल्गुन माह का एक अन्य प्रमुख पर्व रंगभरी एकादशी है, जो इस वर्ष 27 फरवरी को मनाई जाएगी। इस दिन माता गौरा के द्विरागमन का उत्सव मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा को गुलाल अर्पित कर भक्त उनसे होली खेलने की अनुमति मांगते हैं।
रंगभरी एकादशी के साथ ही काशी में चार दिवसीय रंग पर्व की शुरुआत होती है, जो होली तक चलता है। यह पर्व भक्तों और पर्यटकों दोनों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।
काशी में फाल्गुन माह के दौरान होने वाली चिता भस्म की होली देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी वाराणसी पहुंचते हैं। श्मशान घाट पर खेली जाने वाली चिता भस्म की होली शिव के वैराग्य और जीवन-मृत्यु के सत्य का प्रतीक मानी जाती है। वहीं शिव विवाह पर निकलने वाली भव्य बरात भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र होती है। ढोल नगाड़ों और पारंपरिक गीतों के साथ निकलने वाली यह बरात काशी की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक जीवंत बना देती है।
फाल्गुन माह का समापन वर्ष के अंतिम और सबसे बड़े पर्व होली के साथ होता है। Holi बुराई पर अच्छाई और राक्षसी प्रवृत्तियों पर देवभक्ति की विजय का प्रतीक है। इस पर्व पर समाज में प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया जाता है। लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाते हैं और मिठाइयों का आदान-प्रदान करते हैं।
हालांकि इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा पर लगने वाला चंद्रग्रहण Holi के पर्व को विशेष बना देगा। फाल्गुन माह के अंतिम दिन यानी तीन मार्च को ग्रस्तोदय खग्रास चंद्रग्रहण लगेगा। यह चंद्रग्रहण भारत में लगा हुआ ही उदित होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के सूतक काल में शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। इसी कारण इस बार होलिका दहन और रंगोत्सव के बीच एक दिन का अंतर रहेगा।
जानकारों के अनुसार होलिका दहन दो मार्च को किया जाएगा, जबकि रंगोत्सव इस वर्ष अगले दिन तीन मार्च के बजाय चार मार्च को मनाया जाएगा। आमतौर पर होलिका दहन और होली के बीच एक दिन का अंतर नहीं होता, लेकिन चंद्रग्रहण के कारण इस बार तिथियों में बदलाव किया गया है। इसका असर देशभर में होने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों पर भी देखने को मिलेगा।
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