मध्यप्रदेश के रीवा में एक विवाद चल रहा है। यह विवाद विंध्य के नायक, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी की प्रतिमा लगाने को लेकर खड़ा हुआ है। दरअसल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता का आने वाली 17 सितंबर को जन्मदिन है, जिसके उपलक्ष्य में उनकी पीटीएस चौराहे में प्रतिमा लगनी थी, लेकिन उसपर रोक लगा दी गई है। मसला यह है कि जिस जगह पर श्रीनिवास तिवारी की प्रतिमा लगाई जानी है, वह पुलिस की जमीन है, इसलिए प्रतिमा लगाने पर पुलिस प्रशासन ने रोक लगा दी है।
वैसे आज श्रीनिवास तिवारी के बारे में बहुत कम ही लोग जानते हैं। अपनी दमदार आवाज और प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखने के लिए श्रीनिवास संसदीय मामलों के जानकार रहे।
बचपन से ही उन्होंने शिक्षा और समाज सेवा को महत्व दिया। हिंदी और कानून में पढ़ाई पूरी करने के बाद वे वकालत के पेशे से जुड़े, लेकिन भीतर से उनका मन राजनीति और समाज की सेवा की ओर खिंचता रहा। छात्र जीवन में ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए और जेल भी गए। आज़ादी की लड़ाई की तपिश ने उन्हें जनता के संघर्ष से जोड़ दिया और यही रास्ता आगे चलकर उन्हें मध्यप्रदेश की राजनीति का चमकता सितारा बना गया।
सन् 1952 में जब विंध्य प्रदेश एक अलग राज्य था, तब श्रीनिवास तिवारी ने पहला चुनाव लड़ा। उस समय उनके गाँव के लोग इतने समर्पित थे कि उन्होंने अपना सोना गिरवी रखकर उनके चुनाव का खर्च उठाया। चुनाव जीतकर वे विधानसभा पहुँचे और सबसे युवा विधायकों में एक बने। लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष शुरू हुआ जब विंध्य प्रदेश का विलय मध्यप्रदेश में किया गया। तिवारीजी इस विलय के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि विंध्य क्षेत्र की पहचान और हितों की उपेक्षा हो रही है। यही कारण था कि उन्होंने पूरी जिंदगी विंध्य की आवाज बुलंद की और उसकी विशिष्ट पहचान के लिए लड़ते रहे।
लगातार छह दशकों तक राजनीति में सक्रिय रहकर उन्होंने अनेक बार चुनाव जीते। वे मध्यप्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने और बाद में 1993 से 2003 तक विधानसभा अध्यक्ष के पद पर रहे। विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने निष्पक्षता और सख्ती का नया मापदंड तय किया। विपक्ष और सत्ता दोनों ही उनकी कार्यशैली का सम्मान करते थे।
उन्हें लोग व्हाइट टाइगर भी कहते थे। इसका कारण सिर्फ उनका व्यक्तित्व नहीं था, बल्कि उनकी पूरी छवि थी। उनके सफेद बाल, सफेद मूंछें, सफेद धोती-कुर्ता और उनके काफिलों में चलने वाली केवल सफेद कारें उन्हें एक अलग पहचान देती थीं। लेकिन केवल रंग ही नहीं, उनका तेज, निर्भीकता और सत्ता के सामने बिना झुके बोलने का साहस उन्हें शेर की उपमा देता था। यही कारण था कि इंदिरा गांधी ने उन्हें असली शेर कहा और अटल बिहारी वाजपेयी तक ने उनके जज़्बे को सराहा।
सन् 2003 के विस चुनाव में एक किस्सा आम हुआ था कि, विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए श्रीनिवास तिवारी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई का प्लेन उतरने नहीं दिया। दरअसल, मामला कुछ हटकर था। उन्होंने अटलजी को रीवा से चुनाव लडऩे की चुनौती दी थी। वजह थी कि, रीवा में अटलजी की सभा के दौरान किसी ने पर्ची में श्रीनिवास की शिकायत दी थी। तब अटलजी ने तंज कसा था कि, श्रीनिवास को सफेद शेर कहते हैं और, उनसे भयभीत रहते हैं। वो किसी के काम नहीं होने देते।
उनकी ईमानदारी और जनता से जुड़ाव इतना गहरा था कि उन्हें लोग दादा कहकर पुकारते थे। उन्होंने किसानों के अधिकार, शिक्षा, ज़मीन सुधार, संचार, बिजली और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कई अहम कदम उठाए।
उनका जीवन सादगी और संघर्ष का प्रतीक था। बेटा सुंदरलाल तिवारी भी सांसद और विधायक बने, लेकिन जनता के दिलों में श्रीनिवास तिवारी का स्थान अलग ही रहा।
2018 में जब उनका निधन हुआ, तो मध्यप्रदेश ने न केवल एक नेता खोया बल्कि एक ऐसा व्यक्तित्व खोया जिसने पूरी ज़िंदगी जनता की लड़ाई लड़ी। आज भी रीवा और विंध्य क्षेत्र में लोग उन्हें सफेद शेर के नाम से याद करते हैं।
