भाषा मनुष्य की सबसे बड़ी खोजों में से एक है। यह केवल शब्दों और वाक्यों का ढाँचा नहीं बल्कि विचारों, भावनाओं और ज्ञान को साझा करने का माध्यम है। दर्शनशास्त्र के क्षेत्र में भाषा को अक्सर उस टूल के रूप में देखा जाता है जिसके सहारे मनुष्य वास्तविकता को समझता और पुनर्निर्मित करता है। विज्ञान भी इस बात को मान्यता देता है कि भाषा मस्तिष्क की क्षमताओं को आकार देती है और सामाजिक संबंधों को मजबूत करती है। जब हम इस दृष्टि से देखते हैं तो सांकेतिक भाषा केवल बोलने या सुनने की अक्षमता का विकल्प नहीं रह जाती बल्कि यह भाषा और संचार के पूरे विज्ञान को एक नई दिशा प्रदान करती है।
भाषा की यात्रा में सांकेतिक भाषा का इतिहास बहुत रोचक और मानवीय विकास की गवाही देने वाला है। मनुष्य ने जब से संवाद करना सीखा, तब से उसने विचार और भावनाएँ व्यक्त करने के लिए इशारों, हाव-भाव और हाथों की गतिविधियों का सहारा लिया। यही स्वाभाविक संकेत धीरे-धीरे व्यवस्थित होकर सांकेतिक भाषाओं का रूप लेते गए।
प्राचीन सभ्यताओं में बधिर और कम सुनने वाले लोग आपस में संवाद के लिए इशारों का प्रयोग करते थे। ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने भी इशारों के ज़रिए संवाद का उल्लेख किया था। मध्यकालीन यूरोप में धार्मिक संस्थानों और मठों में साधु मौन व्रत रखते हुए संकेतों से ही बात करते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि संकेतों से संवाद करने की प्रवृत्ति सदियों से मानव समाज में मौजूद रही है।
सांकेतिक भाषाओं का वास्तविक संगठित विकास सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में हुआ। स्पेन और फ्रांस में बधिरों के लिए विद्यालय खोले गए जहाँ संकेतों के आधार पर शिक्षा दी जाने लगी। फ्रांस में अब्बे चार्ल्स मिशेल को आधुनिक सांकेतिक शिक्षा का जनक माना जाता है। उन्होंने अठारहवीं सदी में पेरिस में पहला सार्वजनिक विद्यालय स्थापित किया और संकेतों को भाषा के रूप में विकसित किया।
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में अमेरिकी शिक्षक थॉमस हॉपकिन्स गालौडेट और फ्रांसीसी बधिर शिक्षक लॉरेन्ट क्लर्क ने अमेरिका में पहला बधिर विद्यालय खोला। यहाँ फ्रांसीसी सांकेतिक भाषा और स्थानीय संकेत मिलकर अमेरिकी सांकेतिक भाषा यानी ए एस एल का आधार बने। बाद में शोधकर्ताओं ने इसे एक स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता दी।
भारत में बधिर समुदाय लंबे समय से संकेतों का उपयोग करता आ रहा था। लेकिन औपचारिक अध्ययन 1970 के दशक में शुरू हुआ। डॉ. मदन वशिष्ठा ने 1978 में भारतीय सांकेतिक भाषा पर शोध किया और 1981 में इसकी पहली डिक्शनरी प्रकाशित हुई।
सांकेतिक भाषा के प्रचार – प्रसार के लिए अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस हर साल 23 सितंबर को मनाया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र ने इस उद्देश्य से स्थापित किया कि दुनिया में सांकेतिक भाषाओं के महत्व और बधिर लोगों के मानवाधिकारों की गारंटी के बारे में जागरूकता बढ़े। यह दिन 1951 में स्थापित विश्व बधिर महासंघ की स्मृति में मनाया जाता है जो भाषाई समानता और सांस्कृतिक मान्यता की वकालत करता है।
यह दिन दुनिया भर में प्रयुक्त तीन सौ से अधिक सांकेतिक भाषाओं और उन पर निर्भर सत्तर मिलियन से अधिक बधिर लोगों की भूमिका को उजागर करता है। इनमें से अस्सी प्रतिशत से अधिक लोग विकासशील देशों में रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि बचपन से ही सांकेतिक भाषा की उपलब्धता और सेवाएँ बधिर समुदाय के विकास और अधिकारों की पूर्ति के लिए बेहद ज़रूरी हैं। हर वर्ष इस दिवस का एक विशेष विषय चुना जाता है। उदाहरण के लिए 2024 का विषय था “साइन अप फॉर साइन लैंग्वेज राइट्स” जिसमें सरकारों और समाज से कानूनी मान्यता और शिक्षा में सांकेतिक भाषाओं को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया।
इस अवसर पर जन अभियानों, कार्यशालाओं, प्रसिद्ध इमारतों को नीली रोशनी से सजाने और विद्यालयों व समुदायों में जागरूकता फैलाने जैसी गतिविधियाँ आयोजित होती हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य बाधाएँ तोड़ना, समावेशन बढ़ाना और यह सुनिश्चित करना है कि बधिर लोग समाज के हर क्षेत्र में समान रूप से भाग ले सकें।
क्यूंकि भाषा चाहे बोली जाए, लिखी जाए या संकेतों से व्यक्त की जाए, केवल संवाद का साधन नहीं है बल्कि पहचान, रचनात्मकता और समावेशन का आधार है।
