बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और दक्षिण एशिया की सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक मानी जाने वाली शेख हसीना को देश की विशेष अदालत ICT ने मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा सुनाई है। यह फैसला बांग्लादेश के इतिहास में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ माना जा रहा है। हालांकि हसीना का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित है।
शेख हसीना का जन्म 28 सितंबर 1947 को तुंगीपारा में हुआ। पिता शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के संस्थापक माने जाते हैं। ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही वे छात्र राजनीति में सक्रिय हो गईं। बाद में उनकी शादी वैज्ञानिक एम ए वाज़ेद मियां से हुई और उनकी दो संतानें हुईं। उनका निजी जीवन 1975 में तब बुरी तरह टूट गया जब तख्तापलट में उनके पिता समेत पूरा परिवार मारा गया। वह उस समय विदेश में थीं जिससे उनकी जान बच गई लेकिन इस घटना ने उनके राजनीतिक संकल्प को ईंधन दिया।


तख्तापलट के बाद हसीना ने भारत में शरण ली, जहां इंदिरा गांधी से उनकी नज़दीकी बढ़ी। इसी दौरान उन्होंने अवामी लीग में सक्रिय भूमिका निभाई और 1981 में पार्टी प्रमुख बनीं। 1996 में वे पहली बार प्रधानमंत्री बनीं और उसके बाद 2009 से 2024 तक लगातार सत्ता में रहीं। इस दो दशक लंबे कार्यकाल में उन्होंने बांग्लादेश को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत करने का दावा किया और भारत के साथ रणनीतिक रिश्ते को स्थिर बनाए रखा।
लेकिन 2024 के छात्र आंदोलन ने उनकी सत्ता की नींव हिला दी। आरक्षण को लेकर शुरू हुआ विरोध राष्ट्रीय स्तर का विद्रोह बन गया। आरोप लगा कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर अत्यधिक बल का प्रयोग किया और कई मानवाधिकार उल्लंघन हुए। इसी पृष्ठभूमि में ICT ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

आज हसीना के समर्थक उन्हें विकास की प्रतीक आयरन लेडी कहते हैं जबकि आलोचक उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने वाला नेता मानते हैं। फैसले के बाद देश एक गहरे राजनीतिक और सामाजिक विभाजन के दौर से गुजर रहा है और पूरी दुनिया की नज़र बांग्लादेश के अगले कदम पर टिकी है।

