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Reading: भारतीय क्रिकेट का अनसंग हीरो जो बना धैर्य का प्रतीक…’अमोल मजूमदार’ की अनसुनी कहानियां
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Sports

भारतीय क्रिकेट का अनसंग हीरो जो बना धैर्य का प्रतीक…’अमोल मजूमदार’ की अनसुनी कहानियां

उनका करियर इस सदी के सबसे बड़े क्रिकेटीय विरोधाभासों में से एक रहा

Last updated: नवम्बर 1, 2025 3:31 अपराह्न
By Rajneesh 12 महीना पहले
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7 Min Read
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अमोल मजूमदार भारतीय घरेलू क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसा नाम है, जिसने अपने बल्ले से रनों की बारिश की, लेकिन कभी भी टीम इंडिया की जर्सी नहीं पहन सका। 11 नवम्बर 1974 को मुंबई में जन्मे मजूमदार ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 11,000 से अधिक रन बनाए, जिनमें रणजी ट्रॉफी के कई रिकॉर्ड शामिल हैं। लेकिन उनका करियर इस सदी के सबसे बड़े क्रिकेटीय विरोधाभासों में से एक रहा… असाधारण प्रतिभा, जो महानायकों की छाया में दब गई। आज वे भारतीय महिला क्रिकेट टीम के मुख्य कोच हैं, जिन्होंने 31 अक्टूबर 2025 को टीम को वर्ल्ड कप फाइनल तक पहुँचाया। यह सफर मुंबई के मैदानों से लेकर वैश्विक मंच तक की प्रेरक कहानी है।

आइए जानते हैं उनकी ज़िंदगी के कुछ कम ज्ञात किस्से जो उनके धैर्य, संघर्ष और विनम्र सफलता की झलक दिखाते हैं।

बचपन, जवानी और पूरा करियर बस किया इंतजार

साल 1988। हैरिस शील्ड स्कूल टूर्नामेंट का मैच था, शारदाश्रम इंग्लिश स्कूल बनाम रिज़वी हाई स्कूल। 13 वर्षीय अमोल मजूमदार पैड पहनकर बल्लेबाजी के लिए तैयार बैठे थे। पर उन्हें खेलने का मौका ही नहीं मिला। क्योंकि उनके साथी सचिन तेंदुलकर (14) और विनोद कांबली (13) ने मिलकर 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी कर दी, जो आज भी स्कूल क्रिकेट का विश्व रिकॉर्ड है। मजूमदार उस दिन पवेलियन में ही रह गए। बाद में उन्होंने कहा, “वो दिन मेरी पूरी ज़िंदगी का रूपक बन गया…हमेशा तैयार रहना, पर कभी मौका न मिलना।” इसी निराशा ने उन्हें भीतर से तपाया और आने वाले दो दशकों तक लगातार रनों की फसल उगाने की प्रेरणा दी।

पिता की सीख

2002 तक मजूमदार घरेलू क्रिकेट में रनों के पहाड़ खड़े कर चुके थे, लेकिन राष्ट्रीय चयनकर्ताओं की निगाह उन पर नहीं पड़ी। 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने थककर पिता से कहा “बस अब बहुत हुआ, मैं छोड़ देता हूँ।” लेकिन उनके पिता, जो खुद क्लब क्रिकेटर थे, ने उन्हें रोका। उन्होंने कहा — “भारत में नहीं, इंग्लैंड जाकर खेलो।” मजूमदार ने पिता की बात मानी और एक साल इंग्लैंड के लीग क्रिकेट में खेले। वहीं उन्होंने फिर से खेल के प्रति अपना जुनून पाया। भारत लौटे तो नया जोश था और उन्होंने अगले कई वर्षों में रणजी ट्रॉफी में निर्णायक पारियाँ खेलीं। अगर उस वक्त पिता ने साथ न दिया होता तो शायद भारतीय क्रिकेट एक महान बल्लेबाज़ और मार्गदर्शक को खो देता।

‘रैंप शॉट’ का पहला प्रयोग…जमाने से आगे, पर डांट खाई

आज क्रिकेट में ‘रैंप शॉट’ आम बात है, लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में यह कल्पना से परे था। एक बार मजूमदार ने क्लब मैच में ऐसा ही साहसिक शॉट खेला गेंद चौके के लिए गई, पर पिता ने किनारे से चिल्लाकर डांटा, “ये क्या बेवकूफी थी?” वर्षों बाद मजूमदार ने हंसते हुए कहा “अगर मैंने वो शॉट जारी रखा होता, शायद भारत में रैंप शॉट का जन्म दस साल पहले हो जाता।” यह किस्सा उनके स्वाभाविक नवाचार और निडर खेलने के अंदाज़ को दर्शाता है जो अक्सर उनकी सादगी में छिप गया।

मुंबई से असम…टीम बदलकर भी खेल का जुनून कायम रखा

2009 में 34 वर्ष की उम्र में मजूमदार को मुंबई टीम से बाहर कर दिया गया, वह भी उस टीम से जिसके लिए उन्होंने जीवन भर खेला था।
यह झटका गहरा था पर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने असम की रणजी टीम जॉइन की और पहले ही सीज़न में 389 रन बनाए। बाद में 2012 में वे आंध्र प्रदेश के लिए खेलने लगे और 2013 में रिटायर हुए। टीम बदलने का यह फैसला बताता है कि वे सिर्फ नाम या गौरव के लिए नहीं, बल्कि खेल के लिए खेलते थे। इन छोटे राज्यों में उन्होंने कई युवा खिलाड़ियों को तैयार किया। वही अनुभव आज उनके कोचिंग करियर की नींव बना।

कोच अचरेकर के नीचे मिली सीख, मैदान से ज़्यादा ज़िंदगी का सबक

मजूमदार गुरु रमाकांत अचरेकर के शिष्य रहे, वही जिन्होंने सचिन तेंदुलकर को गढ़ा था। अचरेकर की कोचिंग शैली कठोर थी: वे मजूमदार को घंटों तक सचिन की ड्राइव्स पर फील्डिंग कराते रहते उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। यही अभ्यास उनकी सहनशीलता की जड़ बना। घर में पिता और चाचा पुराने मुंबई क्रिकेटरों के.सी. इब्राहिम, दिलीप वेंगसरकर की कहानियाँ सुनाते थे। यही संवेदनशीलता आज उनके कोचिंग में झलकती है, जहाँ वे खिलाड़ी की तकनीक से ज़्यादा उसकी भावनाओं को समझते हैं।

रणजी फाइनल्स में शांत लेकिन निर्णायक नेतृत्व

2006 में मुंबई रणजी टीम की कप्तानी संभालने के बाद मजूमदार ने 2006–07 में टीम को शानदार जीत दिलाई। लेकिन असली कहानी 2008–09 फाइनल की है, जब उत्तर प्रदेश के खिलाफ मुंबई पहली पारी में 205 रन से पीछे थी।

चौथी पारी में 288 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए मजूमदार ने संयम से भरी 51 रनों की पारी खेली और टीम को 38वीं रणजी ट्रॉफी दिलाई।
टीममेट्स बताते हैं कि मुश्किल हालात में उनका शांत स्वभाव सबसे बड़ी ताकत था “वो डरे नहीं, हमें भी डरने नहीं दिया।” देवेंद्र बुंदेला ने उन्हें “बड़े मैचों का मसीहा” कहा था।

अमोल मजूमदार की कहानी क्रिकेट की एक “काव्यात्मक त्रासदी” है। वह खिलाड़ी जो हमेशा तैयार रहा, लेकिन बुलावा कभी नहीं आया। फिर भी, 2025 वर्ल्ड कप फाइनल तक महिला टीम को पहुँचाकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि प्रतीक्षा भी एक कला है और धैर्य भी एक विरासत। उनकी यात्रा यह याद दिलाती है, कभी- कभी महानता कैप से नहीं, बल्कि उन ज़िंदगियों से मापी जाती है जिन्हें आपने छुआ है।

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