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हलाली डैम में मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav ने छोड़े दुर्लभ गिद्ध
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हलाली डैम में मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav ने छोड़े दुर्लभ गिद्ध

गिद्धों के साथ टाइगर इलाकों और जलीय जीव संरक्षण पर भी फोकस

Last updated: फ़रवरी 25, 2026 5:53 अपराह्न
By Divisha 8 महीना पहले
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4 Min Read
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रायसेन स्थित हलाली डैम में मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav ने पांच दुर्लभ गिद्धों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा। इन गिद्धों में चार भारतीय गिद्ध और एक सिनेरेस गिद्ध शामिल हैं। रेस्क्यू और पुनर्वास के बाद सभी गिद्धों को सैटेलाइट टैग लगाकर मुक्त किया गया है।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार सैटेलाइट टैग के माध्यम से गिद्धों की गतिविधियों, उड़ान क्षेत्र और भोजन खोजने की प्रवृत्ति पर नजर रखी जाएगी। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि वे नए वातावरण में किस प्रकार अनुकूलन कर रहे हैं और किन क्षेत्रों में अधिक समय बिता रहे हैं।

गिद्ध संरक्षण की पृष्ठभूमि और चुनौतियां

विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 1990 के दशक में पशु चिकित्सा में उपयोग की जाने वाली डाइक्लोफेनाक दवा के कारण देशभर में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। इस दवा के प्रभाव से मृत पशुओं को खाने वाले गिद्धों में विषाक्तता फैलती थी, जिससे उनकी मृत्यु दर बढ़ गई।

इसके बाद सरकार ने डाइक्लोफेनाक के पशु उपयोग पर प्रतिबंध लगाया और गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए। मध्य प्रदेश में भी प्रजनन केंद्रों, बचाव अभियानों और पुनर्वास योजनाओं के माध्यम से इनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास जारी है।

https://www.instagram.com/reel/DVLYAbMk7tk/?igsh=MXRnbWhiN2E4enZzZA==

सैटेलाइट निगरानी से कैसे मजबूत होगा अभियान

वन विभाग का कहना है कि सैटेलाइट टैगिंग से गिद्धों के प्रवास मार्ग और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान संभव होगी। यदि किसी गिद्ध की गतिविधि असामान्य पाई जाती है तो तत्काल हस्तक्षेप किया जा सकेगा। इससे संरक्षण की रणनीति अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बनेगी।

पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि गिद्ध प्राकृतिक सफाईकर्मी की भूमिका निभाते हैं। वे मृत पशुओं के अवशेषों को शीघ्र समाप्त कर संक्रमण और बीमारियों के खतरे को कम करते हैं। इसलिए उनकी मौजूदगी सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारिस्थितिक संतुलन दोनों के लिए आवश्यक है।

टाइगर क्षेत्रों और नदी पारिस्थितिकी से जुड़ा व्यापक दृष्टिकोण

राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण को एक समग्र दृष्टिकोण से आगे बढ़ा रही है। मध्य प्रदेश देश में बाघों की सर्वाधिक संख्या वाले राज्यों में शामिल है और टाइगर क्षेत्रों में जैव विविधता संतुलन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बाघ संरक्षण के साथ उनके प्राकृतिक आवास और सहायक प्रजातियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक माना गया है।

इसी क्रम में नर्मदा नदी में जलीय जीव संरक्षण की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। पूर्व में मगरमच्छों को प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया था ताकि नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल और नदी दोनों तंत्र एक दूसरे से जुड़े हैं और शीर्ष प्रजातियों की सुरक्षा से ही पर्यावरण संतुलन मजबूत होता है।

वन्यजीव संरक्षण की इन पहलों को राज्य में दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें गिद्ध, बाघ और जलीय जीवों के माध्यम से समग्र जैव विविधता को संरक्षित रखने पर जोर दिया जा रहा है।

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