कुछ लोग इस दुनिया में ऐसे आते हैं जैसे कोई उलझा सवाल जिसका कोई आसान जवाब नहीं होता या होता ही नहीं हैं। कर्ट कोबेन वैसा ही एक सवाल थे। शायद एक खोया हुआ बच्चा जो किसी कोने में बैठकर चुपचाप खुद को खोजता रहा और लड़ता रहा।
वे Nirvana Band के लीड सिंगर, गिटारिस्ट और लिरिसिस्ट थे। कर्ट ने 90’s के डेकेड के म्यूजिकल कल्चर को एक नया मोड़ दिया। उनका सबसे फेमस एल्बम “Nevermind” और उसका अमर सॉंग “Smells Like Teen Spirit” एक पूरी पीढ़ी की बगावत, उलझन और self doubt की identity बन गई।
उनका सुसाइड नोट, जिसमें उन्होंने लिखा था—”It’s better to burn out than to fade away” अपने आप में कई कहानियां कहता है जो हमें बताता है कि कुछ लोग इतने संवेदनशील होते हैं कि इस कठोर दुनिया को सह नहीं पाते।
आज जब भी कोई युवा अपनी उलझनों को शब्दों में ढालना चाहता है, जब भी कोई गिटार उठाकर अपने दर्द को सुरों में उड़ेलता है…कहीं न कहीं उसमें कोबेन की परछाई होती है।
उनकी आत्महत्या से जुड़ी चर्चाएं आज भी जारी हैं…कुछ लोग मानते हैं कि यह एक सोची समझी विदाई थी, जबकि कुछ इसे एक ऐसी पुकार मानते हैं जिसे हमने शायद सुनने में देर कर दी।
कर्ट कोबेन की सबसे बड़ी त्रासदी ये नहीं थी कि वो टूट गया। त्रासदी ये थी कि वो हर पल टूटते हुए भी दूसरों को जोड़ने की कोशिश करते रहे। जब उन्होंने “I feel stupid and contagious” गाया तो वो सिर्फ एक लाइन नहीं थी, वो एक आइना था जिसमें लाखों युवाओं ने खुद को देखा।
कोबेन ने कभी अपनी कमज़ोरियों को छुपाया नहीं, उसने उन्हें गीत बना दिया। लेकिन सवाल ये है…क्या दुनिया ऐसे लोगों को जीने देती है जो अपने ज़ख्मों को खुला छोड़ देते हैं? नहीं क्यूंकि इंसान भी गिद्ध से कम नहीं हैं अगर आपने अपने घाव खुले छोड़ दिए तो जाने अनजाने मे इंसान उसको और कुरेदेगें जब जिसे मौका मिलेगा वो जरूर कुरेदेंगें दुनिया ऐसे लोगों से कहती है…“स्माइल करो, सब ठीक है।” मतलब झूठे बन जाओ। कर्ट कभी भगवान नहीं थे। वो भी बेहद इंसान थे बहुत गहरे, बहुत संवेदनशील, और बहुत अकेले।
कर्ट कोबेन को वो मिला जिसकी चाहत हर कलाकार करता है…फेम, पैसा, करोड़ों चाहने वाले। लेकिन कोबेन ने उस शोहरत को कभी गले नहीं लगाया। उन्हें लगता था कि उन्हें समझा नहीं गया…उनके गीतों को भी, और चुप रह जाने को भी। वो कहते रहे कि “I’d rather be hated for who I am, than loved for who I am not.” इस एक लाइन में उनकी सारी फिलासफी छुपी थी।
5 अप्रैल 1994 को जब कर्ट कोबेन ने खुद को गोली मार ली, तब लोग चौंके, रोए, सवाल पूछे। लेकिन वो जो उसे थोड़ा भी समझते थे, उन्होंने सिर झुका लिया, क्योंकि कहीं न कहीं वो जानते थे कि यह समाज संवेदनशील आत्माओं के लिए जगह नहीं छोड़ता। कर्ट की आत्महत्या को केवल ‘डिप्रेशन’ कहकर अनदेखा कर देना उनकी आत्मा को सीमित करना होगा। वो टूटने से नहीं मरे, वो नहीं समझे जाने की वजह से मरे। वैसे क्यूँ ही कोई समझे भी?
कर्ट कोबेन की झलक आज भी ज़िन्दा है…हर उस कलाकार में, जो भीड़ में भी खुद को अकेला महसूस करता है। हर उस इंसान में, जो खुद से लड़ते हुए भी दूसरों को सुकून देने की कोशिश करना चाहता है।
कर्ट की ज़िंदगी एक कविता थी वो भी बिना अलंकार की कविता। कभी-कभी अधूरी। कभी बहुत कड़वी। लेकिन सच या सच के बहुत करीब।अगर कर्ट कोबेन से एक चीज़ सीखी जा सकती है, तो वो ये है कि अगर तुम खुद को ही खो बैठो तो कोई भी व्यक्ती, धर्म, पैसा या कोई भी सफलता तुम्हें नहीं बचा सकती।