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Reading: मीडिया में जनता की रुचि हो रही कम, अर्थशास्त्रियों की चेतावनी
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मीडिया में जनता की रुचि हो रही कम, अर्थशास्त्रियों की चेतावनी

विज्ञापन का बड़ा हिस्सा अब गूगल और मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनियों को जाता है

Last updated: अक्टूबर 6, 2025 3:53 अपराह्न
By Rajneesh 6 महीना पहले
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4 Min Read
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दुनिया भर के जाने-माने अर्थशास्त्रियों ने हाल ही में चेतावनी दी है कि सार्वजनिक हित वाली मीडिया यानी ऐसी पत्रकारिता जो स्वतंत्र और तथ्य आधारित हो, उसके “पतन” का ख़तरा बहुत गहरा हो गया है। नोबेल विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ और डैरॉन एसेमोग्लू जैसे विद्वानों ने भी इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अगर यह स्थिति बिगड़ती रही तो इसका असर न सिर्फ लोकतंत्र पर पड़ेगा, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था और समाज की स्थिरता पर भी गंभीर प्रभाव डालेगा।

सार्वजनिक हित मीडिया से मतलब है ऐसी पत्रकारिता जिसका मक़सद निजी लाभ या राजनीतिक दबाव से परे जाकर समाज को सच्ची, स्वतंत्र और ज़िम्मेदार जानकारी देना हो। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि आज के समय में यह उतनी ही बुनियादी ज़रूरत है जितनी किसी देश में केंद्रीय बैंक या अन्य सार्वजनिक संस्थान होते हैं। यह लोकतंत्र, भरोसे और सही आर्थिक फैसलों के लिए आधार प्रदान करती है।

मीडिया के कमजोर होने के पीछे कई वजहें हैं जैसे – आर्थिक संकट, 2025 की वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स रिपोर्ट बताती है कि मीडिया संगठनों की आर्थिक स्थिति बेहद नाज़ुक हो गई है। विज्ञापन का बड़ा हिस्सा अब गूगल और मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनियों को जाता है। अखबार और चैनल इसके सामने टिक नहीं पा रहे हैं।

तकनीकी कंपनियाँ मीडिया की ख़बरें इस्तेमाल करती हैं लेकिन पत्रकारिता संगठनों को बराबर का मुआवज़ा नहीं मिलता। इस वजह से मीडिया धीरे-धीरे केवल कंटेंट सप्लाई करने वाले बनकर रह जाते हैं।

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और सोशल मीडिया के ज़रिये फैलने वाली भ्रामक सूचनाएँ असली पत्रकारिता को दबा रही हैं। सनसनीखेज़ और झूठी खबरें ज़्यादा तेज़ी से फैलती हैं और लोग सच्ची जानकारी से दूर होते जा रहे हैं।

इसके बुरे परिणाम नज़र आने लगे हैं। नागरिकों को सही जानकारी नहीं मिल रहे और वे ग़लत दिशा में आसानी से बहकाए जा रहे हैं। लोग अलग-अलग सूचना के घेरे में बंटेंगे जिससे आपसी अविश्वास और संघर्ष बढ़ रहा है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे जैसे सरकारों और समाज को मिलकर पत्रकारिता में कुछ हिस्से का निवेश करना चाहिए ताकि उसकी आर्थिक स्थिति मज़बूत हो सके। बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म से टैक्स या योगदान लिया जा सकता है। हालांकि इसका एक दुष्प्रभाव ये भी होगा कि मीडिया वैसी स्थिति में कैसे खुल के अपना काम कर पायेगा।

अर्थशास्त्री मानते हैं कि क्रिएटिव इंटेलिजंस की वजह से जानकारी का और भी जटिल हो गई है। सच और झूठ में फर्क करना कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में स्वतंत्र पत्रकारिता ही वह दीवार है जो झूठ और दुष्प्रचार से समाज की रक्षा कर सकती है।

यह चेतावनी केवल अनुमान नहीं बल्कि एक गंभीर सच्चाई है। सार्वजनिक हित वाली मीडिया का संकट सीधे लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और सामाजिक एकता से जुड़ा हुआ है। इसे बचाने के लिए साहसिक नीतियाँ, निवेश और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। अगर अभी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसी दुनिया देखेंगी जहाँ सच्चाई दब जाएगी और लोकतंत्र खोखला हो जाएगा।

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TAGGED: Democracy, google, independent journalism, journalism crisis, media, media freedom, meta ai, Press Freedom, public interest media
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