अयोध्या, काशी और मथुरा के बाद उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद के मंदिर होने का दावा किया जा रहा है। इस मामले में 19 नवंबर को सिविल कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। कोर्ट के आदेश के बाद उसी दिन शाम में एडवोकेट कमिश्नर की टीम ने करीब दो घंटे तक मस्जिद का सर्वे किया। 24 नवंबर की सुबह एडवोकेट कमिश्नर की टीम दोबारा सर्वे के लिए मस्जिद पहुंची थी। इस दौरान उन पर पथराव किया गया और कई गाड़ियों में आग भी लगा दी गई। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रण में करने के लिए कार्यवाई की जिसमें चार लोगों की मौत और हिंसा में 15 से 20 सुरक्षाकर्मी घायल हो गए थे।
ये मस्जिद संभल शहर के बीचों-बीच मोहल्ला कोट में स्थित है। मस्जिद की आगे तरफ हिंदू आबादी और पीछे की तरफ मुस्लिम आबादी रहती है। दोनों समुदाय के अलावा ये राष्ट्रीय महत्व की इमारत भी है। हिंदुओं के लिए ये भगवान विष्णु के अगले अवतार कल्कि का धर्मस्थल होगा।
वैसे बाबरनामा के मुताबिक, पानीपत के युद्ध के बाद बाबर संभल पहुंचा। इस ग्रंथ में लिखा है कि वहां एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया था।
इसके अलावा भी देश में इस समय कई हिस्सों पर मंदिरों के उपर दरगाह – मस्जिद बनाने वाले मुद्दे को लेकर कानूनी लड़ाइयां चल रही है। दरअसल इस मे कोई दो राय नहीं कि जब मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत पर सल्तनत की नींव डाली। तो उन्होंने गैर इस्लामिकों पर खूब अत्याचार किया था। उन्होंने न सिर्फ उनका जीवन दूभर किया बल्कि उनके पूजा स्थलों को भी खंडित करके हड़प लिया था। देश में आज भी लगभग ऐसे 900 मंदिर हैं जिन्हें 1192 से 1947 के बीच तोड़कर उनकी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद या चर्च बना दिया गया। इनमें से 100 तो ऐसे हैं जिनका जिक्र हिन्दूओं की 18 महापुराणों में भी है। कई स्थानों के विवाद में 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट अहम बिंदु बना हुआ है।
आज यानी 5 दिसंबर का दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं क्यूंकि जिस समय ये लेख लिखा जा रहा है ठीक उसी समय ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हो रही है। जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस मनमोहन और जस्टिस पीवी संजय कुमार की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट में कुल 6 याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें कुछ में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को रद्द करने की मांग भी की गई है। जजों के कंधे पर एक ऐसी जिम्मेदारी है जो करोड़ों लोगों की आस्था की दिशा और दशा तय करेगी।
1991 की बात है, जब देश में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार थी। राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। उसके बढ़ते प्रभाव के चलते कई और मंदिर-मस्जिद विवाद के लिए भी आवाज़ बुलंद होने लगी थी उठने लगी थी। इन विवादों पर विराम लगाने के लिए नरसिम्हा राव सरकार एक कानून लेकर आई थी। बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के बीच ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट’ को लागू किया गया था। इस कानून के मुताबिक, 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। अगर कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो उसे एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। अयोध्या का मामला उस वक्त कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था।
अब प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट को चुनौती दी गई है। कहा गया है कि यह कानून हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन समुदाय को अपने उन पवित्र स्थलों पर दावा करने से रोकता है, जिनकी जगह पर जबरन मस्ज़िद, दरगाह या चर्च बना दिए गए थे। न्याय पाने के लिए कोर्ट आने के अधिकार से वंचित करता मौलिक अधिकार का हनन है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि नष्ट किए गए मंदिरों का रखरखाव व्यक्तिगत कानूनों के तहत किया जाता है। हिंदू कानून में कहा गया है कि देवता ‘शाश्वत’ हैं और मूर्तियों के नष्ट होने से उन्हें जमीन नहीं खोनी पड़ती। जबकि इस्लामी कानूनों के अनुसार मस्जिद को अधिग्रहित करने के लिए वक्फ की आवश्यकता होती है। मंदिरों के नष्ट होने से वक्फ नहीं बनता और इस्लामी कानून में मस्जिद वैध नहीं है। इस प्रकार, नष्ट किए गए मंदिर अभी भी कानून के अनुसार मंदिर ही कहलायेंगे।
अगर सुप्रीम कोर्ट पूजा स्थल कानून की वैधानिकता पर विचार करता है तो इसका असर काशी-मथुरा सहित ढेरों मंदिर – मस्जिद विवादों पर भी पड़ेगा।