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Reading: राजा त्रिभुवन की पेशकश को नेहरू ने नकारा…क्या सच में भारत का हिस्सा बनना चाहता था नेपाल?
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राजा त्रिभुवन की पेशकश को नेहरू ने नकारा…क्या सच में भारत का हिस्सा बनना चाहता था नेपाल?

आज भी राजपरिवार नेपाल की सरकारों में दखल रहता है

Last updated: सितम्बर 13, 2025 4:44 अपराह्न
By Rajneesh 6 महीना पहले
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4 Min Read
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पिछले 3-4 दिनों से नेपाल हिंसा की आग में चल रहा था। वहाँ अब सत्ता परिवर्तन हो गया है। नेपाल में राजनीतिक संकट और विरोध प्रदर्शनों के बाद 2008 में राजशाही समाप्त कर दी गई थी। लेकिन आज भी राजपरिवार का आज भी नेपाल की सरकारों में दखल रहता है। सालो से नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता रही जिस वजह से वो कभी ठीक से नहीं पनप पाया।

फ़िलहाल प्रदर्शन के बीच एक लड़के का वीडियो सामने आया जिसमें उसने कहा कि अगर नेपाल में भी भारत जैसी मौजूदा सरकार और पीएम मोदी जैसा कोई होता नेपाल कहीं और होता। उस लड़के की बात के बात से लोग फिर उसी किस्से को याद करने लगे जब नेपाल भारत का हिस्सा हो सकता था।

दरअसल 1846 से 1951 तक नेपाल पर राणा शासकों का शासन था। इस दौरान नेपाल पूरी दुनिया से कटा रहा। 1949 में नेपाल के पड़ोस चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हुई तो यहां भी सत्ता में परिवर्तन हुआ। उस वक्त तक नेपाल के त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह विदेश में थे।

फिर जब 1951 में वह नेपाल लौटे तो उन्होंने वहां संवैधानिक राजशाही प्रथा की शुरुआत की थी। इसी दौरान उन्होंने चीन की आक्रामकता के खिलाफ पंडित नेहरू से नेपाल का भारत में विलय कराने का अनुरोध किया था। चीन में कम्युनिस्ट क्रांति हो चुकी थी और चीन विस्तारवादी नीति के तहत 1950 तक तिब्बत पर कब्जा कर चुका था। उसी दौर में चीन और भारत के बीच स्थित एकमात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल भी राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। उस वक्त राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह नेपाल के राजा थे। चीन की बढ़ती आक्रामकता का वजह से त्रिभुवन बीर चिंतित हो गए थे। तब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को ये ऑफर दिया था कि वह हिमालयी देश नेपाल का विलय भारत में कर लें और उसे एक राज्य बना दें लेकिन पंडित नेहरू ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।

भूतपूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपनी किताब “द प्रेसिडेंशियल इयर्स” में लिखा है कि नेपाल भारत में विलय चाहता था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। मुखर्जी के अनुसार, नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने यह प्रस्ताव नेहरू के सामने रखा था लेकिन पंडित नेहरू ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसा ही रहना चाहिए।

अपनी एक अलग किताब ‘माई प्राइम मिनिस्टर: डिफरेंट स्टाइल्स, डिफरेंट टेम्परामेंट्स’ शीर्षक के अंतर्गत मुखर्जी ने ये भी लिखा है, कि “अगर इंदिरा गांधी नेहरू की जगह प्रधानमंत्री होतीं, तो शायद वह इस अवसर का लाभ उठातीं, जैसा उन्होंने सिक्किम के मामले में किया था।”

फिर समय के साथ उसी नेपाल से जो कभी भारत का हिस्सा बनने की चाह रखता था, भारत के संबंध बिगड़ने लगे। दोनों देशों के बीच गहरी ऐतिहासिक-सांस्कृतिक नज़दीकियां, खुली सीमा, रोटी-बेटी का रिश्ता होने के बावजूद कई घटनाओं ने रिश्तों को प्रभावित किया। भारत–नेपाल संबंध कभी भी एकदम से खराब नहीं हुए, बल्कि धीरे-धीरे कई राजनीतिक, रणनीतिक और आंतरिक कारणों से इनमें तनाव पैदा हुआ। जैसे नेपाल ने 2015 में नया संविधान लागू किया। भारत ने चिंता जताई कि इसमें मधेशी, थारू और तराई क्षेत्र के अन्य समुदायों को पर्याप्त अधिकार और प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। भारत ने इसे खुलकर सामने रखा, जिससे नेपाल की राजनीति में यह धारणा बनी कि भारत उनके आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है। लेकिन फिर भी दोनों देशों की भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक रिश्ते और आर्थिक ज़रूरतें इतनी गहरी हैं कि रिश्तों में तनाव के बावजूद पूरी तरह दूरी संभव नहीं है।

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TAGGED: india nepal relations, indo nepal border, Jawaharlal Nehru, nepal politics, nepal protests, tribhuvan bir bikram shah
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