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Reading: रेप पीड़िताओं के लिए Jharkhand Highcourt की नई गाइडलाइंस, 2-फिंगर टेस्ट पर रोक
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National

रेप पीड़िताओं के लिए Jharkhand Highcourt की नई गाइडलाइंस, 2-फिंगर टेस्ट पर रोक

शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान पर जोर

Last updated: जून 9, 2026 5:42 अपराह्न
By Divisha 3 महीना पहले
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9 Min Read
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Jharkhand Highcourt: यौन हिंसा केवल एक आपराधिक घटना नहीं होती, बल्कि यह पीड़िता और उसके परिवार के जीवन पर गहरा मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव छोड़ती है। भारत में लंबे समय से रेप पीड़िताओं को न्याय मिलने की प्रक्रिया कई चुनौतियों से घिरी रही है। शिकायत दर्ज कराने से लेकर मेडिकल जांच, पुलिस कार्रवाई, सामाजिक तिरस्कार और अदालतों में लंबी कानूनी प्रक्रिया तक, पीड़िताओं को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए Jharkhand Highcourt ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने रेप पीड़िताओं की सुरक्षा, सम्मान, पुनर्वास और उनके बच्चों के भविष्य को लेकर कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं। यह फैसला केवल कानूनी सुधार नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त पीड़िता-दोषारोपण (Victim Blaming) की मानसिकता के खिलाफ भी एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।

कैसे शुरू हुआ यह मामला?

यह मामला एक जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा था, जिसमें रेप पीड़िताओं के संरक्षण, पुनर्वास और न्याय प्रक्रिया में सुधार की मांग की गई थी। याचिका में कई गंभीर मुद्दे उठाए गए थे, जिनमें शामिल थे

  • जीरो एफआईआर दर्ज करने में देरी
  • पीड़िताओं के लिए पर्याप्त आश्रय और सहायता का अभाव
  • जांच और सुनवाई में देरी
  • मीडिया द्वारा पहचान उजागर किए जाने की घटनाएं
  • प्रतिबंधित “टू-फिंगर टेस्ट” का उपयोग
  • रेप से जन्मे बच्चों की शिक्षा और पुनर्वास

इन सभी मुद्दों पर सुनवाई के बाद Jharkhand Highcourt ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए।

2-फिंगर टेस्ट पर पूर्ण प्रतिबंध

Jharkhand Highcourt के सबसे महत्वपूर्ण निर्देशों में से एक है “टू-फिंगर टेस्ट” पर पूर्ण रोक। यह टेस्ट वर्षों तक रेप मामलों की मेडिकल जांच में इस्तेमाल किया जाता रहा, जिसमें यह जांचने की कोशिश की जाती थी कि महिला पहले से यौन संबंधों की आदी है या नहीं। विशेषज्ञों और महिला अधिकार संगठनों ने लंबे समय से इस प्रक्रिया को अमानवीय, अपमानजनक और वैज्ञानिक आधार से रहित बताया है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि यह परीक्षण महिलाओं की गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि ऐसा परीक्षण करने वाले व्यक्तियों को कदाचार का दोषी माना जा सकता है।

Jharkhand Highcourt ने अब स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि राज्य में किसी भी रेप पीड़िता पर यह परीक्षण नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि किसी महिला का पूर्व यौन जीवन यह तय नहीं करता कि उसके साथ बलात्कार हुआ है या नहीं।

समाज की मानसिकता पर अदालत की चिंता

फैसले में अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे को भी उठाया। अदालत ने कहा कि कई मामलों में रेप पीड़िताओं को ऐसे देखा जाता है जैसे वे स्वयं अपराधी हों। उन्हें सामाजिक उपहास, तिरस्कार और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। कई बार परिवारों को अपना घर और मोहल्ला तक छोड़ना पड़ता है क्योंकि पड़ोसियों का व्यवहार असंवेदनशील होता है।अदालत ने कहा कि यह स्थिति बदलने की आवश्यकता है और समाज को संवेदनशील बनाने के लिए व्यापक प्रयास किए जाने चाहिए। न्यायालय ने उम्मीद जताई कि समय के साथ लोगों की पीड़िता-दोषारोपण वाली मानसिकता बदलेगी और पीड़िताओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिलेगा।

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रेप से जन्मे बच्चों को मिलेगी मुफ्त शिक्षा

इस फैसले का सबसे दूरगामी प्रभाव संभवतः उन बच्चों पर पड़ेगा जो रेप की घटनाओं के परिणामस्वरूप जन्म लेते हैं। ऐसे बच्चों को अक्सर सामाजिक भेदभाव, आर्थिक कठिनाइयों और पहचान के संकट का सामना करना पड़ता है। कई बार उनकी शिक्षा भी प्रभावित होती है। इसे ध्यान में रखते हुए Jharkhand Highcourt ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे सभी बच्चों को कक्षा 12 तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाए। इसके लिए प्रत्येक जिले में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी, जो यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 21A तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) की भावना के अनुरूप माना जा रहा है।

IIT, AIIMS और IIM तक की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति

अदालत ने केवल प्राथमिक शिक्षा तक ही अपनी चिंता सीमित नहीं रखी। यदि रेप से जन्मा कोई बच्चा भविष्य में IIT, NIT, AIIMS, IIM या अन्य प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में प्रवेश प्राप्त करता है, तो उसे राज्य सरकार की ओर से छात्रवृत्ति उपलब्ध कराई जाएगी। यह व्यवस्था इस सोच को दर्शाती है कि ऐसे बच्चों को केवल जीवित रहने का अवसर नहीं, बल्कि आगे बढ़ने और अपने सपनों को पूरा करने का अधिकार भी मिलना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह देश में पहली बार है जब किसी अदालत ने इतने स्पष्ट रूप से उच्च शिक्षा और करियर अवसरों को भी पुनर्वास नीति का हिस्सा बनाया है।

जीरो एफआईआर और त्वरित जांच पर जोर

Jharkhand Highcourt ने पुलिस व्यवस्था में सुधार को लेकर भी कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।

अदालत ने कहा कि:

  • किसी भी रेप मामले में जीरो एफआईआर दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) के नाम पर शिकायत टालना गलत होगा।
  • प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी की जाए।
  • पूरी जांच अधिकतम दो महीने के भीतर समाप्त की जाए।

न्यायालय ने झारखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) को इन निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।
यदि कोई पुलिस अधिकारी इन नियमों का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

पुलिस को दिया जाएगा संवेदनशीलता प्रशिक्षण

अक्सर देखा गया है कि यौन अपराधों के मामलों में पीड़िताएं पुलिस थानों में भी असहज महसूस करती हैं। इसी समस्या को दूर करने के लिए अदालत ने निर्देश दिया कि पुलिसकर्मियों को नियमित रूप से संवेदनशीलता प्रशिक्षण दिया जाए।

पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि:

  • पीड़िता का बयान मित्रवत वातावरण में दर्ज किया जाए।
  • उस पर किसी प्रकार का दबाव न डाला जाए।
  • उसे सम्मान और सुरक्षा का अनुभव हो।
  • उसकी गोपनीयता पूरी तरह सुरक्षित रखी जाए।

24 घंटे के भीतर सहायता और संरक्षण

यदि पीड़िता नाबालिग है या उसे तत्काल सुरक्षा की आवश्यकता है, तो उसे 24 घंटे के भीतर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

इसमें शामिल हैं:

  • मेडिकल जांच
  • सुरक्षित आश्रय गृह
  • काउंसलिंग
  • कानूनी सहायता
  • मनोवैज्ञानिक सहयोग

अदालत ने कहा कि पीड़िताओं को केवल कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए जिसे तत्काल भावनात्मक और सामाजिक समर्थन की आवश्यकता है।

वन-स्टॉप सेंटरों में सुधार के निर्देश

महिलाओं के लिए बनाए गए “वन-स्टॉप सेंटर” कई बार संसाधनों और प्रबंधन की कमी से जूझते हैं। हाईकोर्ट ने महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि इन केंद्रों की सभी कमियों को दूर किया जाए।

साथ ही महिलाओं की अध्यक्षता वाली एक समिति गठित करने को कहा गया है जो:

  • शिकायतों की निगरानी करेगी
  • सेवाओं की गुणवत्ता का मूल्यांकन करेगी
  • पीड़िता-केंद्रित व्यवस्था सुनिश्चित करेगी

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

यह फैसला केवल एक न्यायिक आदेश नहीं है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था में उस बदलाव का प्रतीक है जिसमें ध्यान केवल अपराधी को सजा देने पर नहीं, बल्कि पीड़िता और उसके परिवार के पुनर्वास पर भी केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह रेप पीड़िताओं को दया का पात्र नहीं, बल्कि अधिकारों वाले नागरिक के रूप में देखता है। मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्ति, सम्मानजनक व्यवहार, त्वरित जांच, कानूनी सहायता और सामाजिक पुनर्वास जैसे कदम एक समग्र न्याय प्रणाली की ओर संकेत करते हैं।

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