इस समय पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 100 वर्ष पूरे करने को लेकर चर्चा में है। बीती विजयदशमी पर संघ 101वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। एक साल बाद यानी 17 अप्रैल 1926 को संगठन को अपना नाम ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ मिला। संघ के प्रति आकर्षित करने वाली कई चीजों में से एक उनका गणवेश है। सालों साल इस गणवेश में भी कई बदलवा हुए जिसकी कहानी भी दिलचस्प है।
RSS की स्थापना के समय संघ की यूनिफॉर्म में खाकी शर्ट, खाकी हाफ पैंट और खाकी टोपी और शॉर्ट लेदर बेल्ट शामिल थी। यानी खाकी पैंट संघ के यूनिफॉर्म में इसकी स्थापना के वक्त से ही जुड़ी है। हॉफ पैंट ही यूनिफॉर्म के लिए क्यों चुनी गई, इसके पीछे की वास्तविक वजह पर कोई ठोस वजह नहीं लिखी है लेकिन ऐसा माना जाता है कि इस पैंट का चुनाव शायद शारीरिक व्यायाम को ध्यान में रखकर किया गया होगा जो संघ की शाखाओं में होता था।
1920 में आर्मी से रिटायर हुए मार्तंड राव जोग संघ से जुड़े तो उन्हें युवकों के प्रशिक्षण का काम दिया गया था और वो आर्मी के तरीके से ही ड्रिल आदि करवाते थे। इसी के चलते इसमें लाठी भी जुड़ गई थी।
शुरू में यूनिफॉर्म का हिस्सा रही खाकी टोपी को संघ की स्थापना के पांच साल बाद ही साल 1930 में काली टोपी में बदल दिया गया। हां, पांच साल बाद खाकी टोपी को काली टोपी से बदल दिया गया था। इस बदलाव के पीछे भी कोई वजह आज तक स्पष्ट नहीं है। संघ के पक्ष में सोचने वाले इसके पीछे की वजह खुद को सैन्य संगठनों से अलग रूप देने की इच्छा बताते हैं।
इस दौरान कुछ संघ का विरोध करने वाले लोग उस काली टोपी को ‘मुसोलिनी’ की सेना की काली टोपी से जोड़ते रहे। हालांकि दोनों टोपियों में काफी अन्तर नजर आता है।
फिर साल 1939 में संघ की शर्ट का रंग भी बदल दिया गया और यह खाकी से सफेद कर दी गई। इसके पीछे ब्रिटिश शासन की तरफ से संघ की यूनिफॉर्म और ड्रिल पर लगाया गया बैन था। इसके बाद आरएसएस की यूनिफॉर्म में जूते और बेल्ट तक में भी बदलाव देखने को मिला और खाकी रंग केवल हाफ पैंट और मोजों में रह गया।
संघ के गणवेश में बड़ा बदलाव 1940 में भी देखने मिला, और इसकी वजह थे अंग्रेज। जब दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ तो भारत में अंग्रेज भी सतर्क हो गए और संघ पर उनकी खास नज़र थी। उन दिनों संघ की गणवेश में लम्बा बूट था। ये बूट नागपुर में ही बनता था। संघ ने इन लंबे बूट्स को भी इमरजेंसी के दौरान अलविदा कह दिया था और उनके स्थान पर आज जो काले जूते चलते हैं, उन्हें अपना लिया।
जूतों को बदलने के बाद 2010 – 11 में बेल्ट भी बदल कर कैनवास की कर दी गई थी। उसी वक्त बरसों पुरानी मांग दोहराई गई कि निकर की जगह फुल पेंट होनी चाहिए ताकि उससे पहनने में संकोच कर रही युवा पीढ़ी को सहजता मिले। लेकिन ये तय हुआ कि पांच साल बाद इस विषय पर निर्णय लिया जाएगा।
फिर साल 2016 में आरएसएस ने अपनी यूनिफॉर्म में एक और महत्वपूर्ण बदलाव किया। खाकी हाफ पैंट की जगह संघ के गणवेश में भूरे रंग की फुल पैंट को शामिल किया गया। तब संघ के महासचिव भैयाजी जोशी ने कहा था कि इस पैंट को चुनने के पीछे कोई खास कारण नहीं है। हालांकि, ऐसा माना गया था कि संघ की यूनिफॉर्म के हाफ पैंट का आकार और इसका रंग बड़े युवा वर्ग तक जुड़ने में कहीं न कहीं अड़चन बना हुआ था। ऐसे में संघ को उम्मीद थी कि यूनिफॉर्म में बदलाव करने के बाद वह ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर पाएगा।
