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Reading: ऑपरेशन सिन्दूर के समय से अमेरिकी सरकार और भारतीय विपक्ष की एक जैसी रणनीति
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ऑपरेशन सिन्दूर के समय से अमेरिकी सरकार और भारतीय विपक्ष की एक जैसी रणनीति

ट्रम्प ने कई बार भारत - पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने का दावा किया

Last updated: सितम्बर 9, 2025 3:28 अपराह्न
By Rajneesh 1 वर्ष पहले
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4 Min Read
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मई 2025 में हुए “ऑपरेशन सिन्दूर” के बाद भारत की आंतरिक राजनीति और वैश्विक कूटनीति दोनों ही नए मोड़ पर पहुँच गए। पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले, जहाँ पहलगाम में 26 निर्दोष नागरिक मारे गए के जवाब में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों पर सटीक सैन्य कार्रवाई की। यह ऑपरेशन अत्यंत नियंत्रित था, जिसमें नागरिक हानि से बचते हुए पाकिस्तान के आतंकी इलाक़ों में हमले किए गए थे। पाकिस्तान की प्रतिक्रिया में हुई ड्रोन और मिसाइल हमलों को भारत ने सफलतापूर्वक रोक दिया।

इस सैन्य सफलता के बाद, अमेरिका और भारतीय विपक्ष दोनों ही भारत सरकार पर हमलावर हुए। दिलचस्प यह है कि आलोचनाओं की शैली और ब्लूप्रिंट लगभग समान दिखा, चाहे वह औद्योगिक घरानों पर आरोप हों या फिर जाति से जुड़े प्रश्न।

ऑपरेशन सिन्दूर के तुरंत बाद अमेरिकी नीति का रुख भारत के प्रति अधिक टकरावपूर्ण हो गया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिए, यह कहते हुए कि भारत की व्यापार नीतियाँ “अनुचित और अस्वीकार्य” हैं। साथ ही रूस से तेल आयात पर भी प्रतिबंध और जुर्माने लगाए गए। अमेरिका की आलोचना ने भारत के “मेक इन इंडिया” अभियान और भारतीय कॉर्पोरेट घरानों की भूमिका पर उंगलियाँ उठाईं, यह कहते हुए कि सत्ता और उद्योगपतियों की नज़दीकी पारदर्शिता पर सवाल खड़े करती है।

भारतीय विपक्ष ने अमेरिका की आलोचनाओं को ही आगे बढ़ाया और अक्सर उसी तरह की भाषा का उपयोग किया। ट्रम्प ने कई बार भारत – पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराने का दावा किया जिसे भारतीय प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री सहित सरकार द्वारा बार – बार खंडन किया गया। लेकिन विपक्ष ख़ासतौर पर LOP राहुल गांधी जैसे नेता ने भारत से ज्यादा ट्रम्प के बयानों पर विश्वास दिखाते हुए उनकी प्रतिध्वनि बनने का काम किया।

विपक्ष लंबे समय से भाजपा सरकार पर बड़े उद्योगपतियों का पक्ष लेने का आरोप लगाता आया है, और यही बात अमेरिका की आलोचना से मिलती-जुलती है।

इसके अलावा हाल ही में ट्रम्प के बेहद करीबी ‘पीटर नोवारा’ ने हाल ही में कहा कि “भारत के रूस से तेल लेने में ब्राम्हण मुनाफाखोरी करते हैं” – अमेरिकी Trade advisor का भारत की एक जाति पर comment करना किसी को भी बेतुका लगेगा। लेकिन ये बयान भी शायद इसलिए दिया गया ताकि भारतीय विपक्ष इस बात को दोहरा कर इसकी प्रतिध्वनि बन पाए क्यूंकि भारत में विपक्ष ने पहले ही जातियों का नैरेटिव फैला रखा है।

पहले विदेशों में जाति का मुद्दा उठाया जाता है, फिर वही तर्क विपक्षी पार्टियों द्वारा देश के भीतर सरकार पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ऐसा लगता है कि मुद्दों की स्क्रिप्ट पहले यहां तय होती है और वहां भेजी जाती है। ये बात इसलिये बेतुकी नहीं है क्यूंकि ज्यादातर भारतीयों की मानसिकता में अभी भी गुलामी के गुण गौण रूप से ही लेकिन मिले हुए तो हैं… आज भी कोई विदेशी कोई भी ऊल जलूल बात अंग्रेजी में कह दे तो भारतीय उसे गुन गुनाते हुए अंतिम सच मान लेते हैं।

हमारा ये दावा मनगढ़ंत नहीं ब्लकि समानांतर रणनीति के सबूत किया गया है। काफी समय से अमेरिका और भारतीय विपक्ष की आलोचनाओं में स्पष्ट समानताएँ देखी जा सकती हैं। जैसे समान भाषा, एक समान तर्क और भ्रामक सूचना फैलाने वाली विशुद्ध राजनीति…यह पैटर्न इस ओर इशारा करता है कि बाहरी और आंतरिक दबाव एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं और सरकार पर लगातार हमला करने का अवसर प्रदान करते हैं

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TAGGED: India Pak war, Operation Sindoor, Rahul Gandhi, thefourth, thefourthindia, trump
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