रिटायर हो चुके अशोक खेमका के रास्ते पर एक और अधिकारी चल रहा है। तुकाराम मुंढे को बीस साल की नौकरी में 24 तबादले मिल चुके हैं। बावजूद इसके, तेवर और सख्ती बरकरार है। पिछले हफ्ते फिर से तबादला कर दिया है। असंगठित कामगार आयुक्त के पद से कल्याण विभाग के सचिव पद पर भेजा जा रहा है।
बीड़ के रहने वाले तुकाराम 2005 IAS बैच के अधिकारी हैं। पहली बार उनकी चर्चा तब हुई, जब नांदेड़ में अपर कलेक्टर रहते सरकारी स्कूल में दबिश दी थी। कई शिक्षक गैर-हाजिर थे। सभी को उसी समय सस्पेंड कर दिया। दूसरे स्कूलों को भी चेतावनी दे दी कि सुधर जाओ, वरना नौकरी खत्म।
शिक्षा विभाग में खास काम
शिक्षा विभाग में उनके रहते शिक्षकों की गैर-हाजिरी 12 से घट कर 3 फीसद पर आ गई थी।
सोलापुर से शुरू हुई उनकी यात्रा आदिवासी इलाकों तक गई। फिर नागपुर, नासिक, जालना में काम किया। कई मंदिरों में वीआइपी दर्शन बंद करवा दिए। नासिक में आदिवासी आयुक्त रहते उनके फैसलों से हजारों आदिवासियों को फायदा मिला था। सोलापुर में नदियों में गंदगी रोकने के मकसद से तीन हजार शौचालय बनवाए थे। ये उस दौर की बात है, जब सरकार का शौचालय अभियान ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था।
कमिश्नर वॉक शुरू करवाई
मुंबई नगर पालिका में कमिश्नर थे। वहां उन्होंने ‘कमिश्नर मॉर्निंग वॉक’ शुरू करवाई थी। अधिकारियों को आदेश दिया था कि पार्क, स्कूल-कॉलेज, चौराहे… हर जगह जाओ। वहीं लोगों की परेशानी सुनो और दूर करो। अगर किसी आम आदमी को चक्कर लगवाए, तो ठीक नहीं होगा।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना विधायक से भी भिड़ गए थे। उद्धव ठाकरे के सीएम रहते हुए भी शिवसेना से नहीं दबे। उनका तबादला करवा दिया गया। नेताओं को भी हिदायत है कि कुछ बहुत जरूरी काम हो, तो ही बुलाएं या मिलने आएं। नौकरी का एक-एक मिनट समाज की बेहतरी और आम आदमी के लिए है। तुकाराम न किसी कार्यक्रम में जाते हैं और न ही किसी नेता के साथ फोटो में नजर आते हैं। नौकरी की शुरुआत में कई से भिड़ंत होती थी, अब धीरे-धीरे सभी उनका स्वभाव जान गए हैं। नेता भले ही तुकाराम से नाक-मुंह सिकोड़ते हों, लेकिन सरकारें उनकी अहमियत जानती हैं। बार-बार तबादला तो झेलना पड़ा है… कई बार इनाम भी दिया गया है। उन्हें उत्कृष्ट आइएएस अधिकारी भी कहा जाता है।
