मध्य प्रदेश सरकार ने Nagar Nigam Budget में महापौर निधि के प्रावधान पर रोक लगा दी है। नगरीय प्रशासन विभाग द्वारा जारी इस आदेश के बाद प्रदेश के सभी नगर निगमों में महापौर निधि का प्रावधान समाप्त होने की स्थिति बन गई है। इस फैसले को नगर निगम चुनाव से पहले महापौर के अधिकारों में कटौती के रूप में देखा जा रहा है।
इंदौर नगर निगम के पिछले बजट में महापौर निधि के लिए दस करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इस निधि का उपयोग महापौर अपने विवेक से विभिन्न कार्यों और योजनाओं के लिए करते थे। अब नए आदेश के बाद वित्तीय वर्ष 2026 से 27 से इस व्यवस्था पर रोक लग जाएगी।
नगरीय प्रशासन विभाग ने जारी किया आदेश
इस संबंध में नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के उप सचिव प्रमोद कुमार शुक्ला ने आदेश जारी किया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि नगर पालिक निगमों द्वारा अपने बजट में महापौर निधि का अलग से प्रावधान किया जाता रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 में इसके लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
आदेश के अनुसार अधिनियम के अध्याय सात में नगर पालिक निधि से जुड़े प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। इसमें निगम की आय और व्यय का अनुमान पत्रक तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है, लेकिन महापौर निधि के नाम से अलग प्रावधान का उल्लेख नहीं है।
सरकार ने निर्देश दिए हैं कि बजट तैयार करते समय मध्य प्रदेश नगर पालिक निगम अधिनियम 1956 और मध्य प्रदेश नगर पालिक निगम लेखा एवं वित्त नियम 2018 में दिए गए नियमों का ही पालन किया जाए।
इंदौर में दस करोड़ रुपये की थी महापौर निधि
इंदौर नगर निगम के पिछले बजट में महापौर निधि के लिए दस करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। यह राशि महापौर के विवेकाधिकार के तहत खर्च की जाती थी।
महापौर इस निधि के माध्यम से अपने क्षेत्र में विभिन्न छोटे विकास कार्यों, सामाजिक गतिविधियों और नागरिक सुविधाओं से जुड़े कार्यों के लिए राशि स्वीकृत कर सकते थे। इस कारण इसे महापौर के महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक माना जाता था।अब सरकार के नए आदेश के बाद नगर निगम के बजट में इस तरह का अलग प्रावधान करना संभव नहीं होगा।
पूरे प्रदेश में लागू होगी व्यवस्था
सरकार का यह आदेश केवल इंदौर तक सीमित नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश के सभी नगर निगमों पर लागू होगा। प्रदेश के अन्य नगर निगमों में भी महापौर निधि का प्रावधान किया जाता रहा है।
नए निर्देशों के अनुसार अब आगामी बजट तैयार करते समय इस निधि को शामिल नहीं किया जाएगा। इससे नगर निगमों की बजट प्रक्रिया में भी बदलाव देखने को मिलेगा। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि बजट निर्माण पूरी तरह से अधिनियम और वित्तीय नियमों के अनुसार ही किया जाएगा।
चुनाव से पहले बड़ा फैसला
प्रदेश में अगले वर्ष नगर निगम चुनाव होने वाले हैं। ऐसे समय में सरकार द्वारा महापौर निधि पर रोक लगाने के फैसले को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से महापौर के विवेकाधिकार में कमी आएगी। पहले महापौर इस निधि के जरिए विभिन्न क्षेत्रों में छोटे विकास कार्यों को स्वीकृति दे सकते थे और जनता से सीधे जुड़ाव बना सकते थे। अब इस व्यवस्था के समाप्त होने से महापौर के पास खर्च के लिए अलग से उपलब्ध निधि नहीं रहेगी।
अधिकारों में कटौती की चर्चा
सरकार के इस फैसले के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि महापौर के अधिकारों में कटौती की जा रही है। कई लोग इसे नगर निगम चुनाव से पहले लिया गया एक बड़ा प्रशासनिक निर्णय मान रहे हैं।
हालांकि सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि यह फैसला केवल अधिनियम और वित्तीय नियमों के अनुरूप बजट प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। इसके बावजूद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में इस फैसले को लेकर अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
वित्तीय वर्ष 2026 से 27 से लागू होगा आदेश
नगरीय प्रशासन विभाग के निर्देशों के अनुसार यह व्यवस्था आगामी वित्तीय वर्ष 2026 से 27 से लागू होगी। इसका मतलब है कि आने वाले नगर निगम बजट में महापौर निधि का प्रावधान नहीं किया जाएगा।
इस फैसले के बाद नगर निगमों की वित्तीय संरचना और बजट प्रक्रिया में बदलाव देखने को मिल सकता है। प्रशासन का कहना है कि सभी निगमों को नए निर्देशों के अनुसार ही बजट तैयार करना होगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले के बाद नगर निगमों की कार्यप्रणाली और स्थानीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है।
