अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी व्यापक टैरिफ नीति को बचाने के लिए अब सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए हैं। यह मामला इस बात पर निर्णायक कानूनी और राजनीतिक लड़ाई बन गया है कि आर्थिक नीतियों में राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा कहाँ तक है और टैक्स लगाने का असली अधिकार केवल कांग्रेस का है या नहीं। निचली अदालतें पहले ही बार बार इन टैरिफ को गैरकानूनी ठहरा चुकी हैं और अब मामला देश की सर्वोच्च अदालत में है।
ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां कानून यानी IEEPA का इस्तेमाल करते हुए लगभग हर देश से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ लगाए। इसमें चीन, मैक्सिको, कनाडा और भारत पर भी कठोर शुल्क शामिल थे। उन्होंने व्यापार घाटे और नशीली दवाओं की तस्करी को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर इन कदमों को जायज ठहराया।
इसके खिलाफ कई मुकदमे दायर हुए जिनमें छोटे व्यवसायियों और लिबर्टी जस्टिस सेंटर जैसी संस्थाओं ने चुनौती दी। उनका कहना था कि अमेरिकी संविधान और ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार टैरिफ लगाने का अधिकार केवल कांग्रेस के पास है राष्ट्रपति के पास नहीं।
29 अगस्त 2025 को फेडरल सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स ने 7-4 के फैसले में कहा कि राष्ट्रपति ने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण किया है। अदालत ने साफ कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को अनिश्चित काल तक और इतने व्यापक स्तर पर टैरिफ लगाने की इजाजत नहीं देता। टैरिफ लगाना मूल रूप से कांग्रेस की शक्ति है।
इससे पहले मई 2025 में कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड भी यही कह चुका था। हालांकि दोनों अदालतों ने यह भी कहा कि टैरिफ फिलहाल लागू रहेंगे ताकि सुप्रीम कोर्ट में अपील का समय मिल सके।
3 सितंबर 2025 को ट्रंप प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की और कहा कि निचली अदालत का फैसला अमेरिका की आर्थिक ताकत को कमजोर कर देगा। उनका तर्क था कि इससे कूटनीतिक दबाव कम होगा और व्यापारिक समझौते टूट सकते हैं।
ट्रंप की टीम ने सुप्रीम कोर्ट से तेज सुनवाई की मांग की और नवंबर में बहस कराने का प्रस्ताव रखा। उनका कहना है कि व्यापार घाटा और मादक पदार्थों की तस्करी जैसी आपात स्थितियाँ राष्ट्रपति को IEEPA के तहत यह अधिकार देती हैं।
सुनवाई के दौरान ट्रंप प्रशासन भारत पर लगाए गए टैरिफ को उचित साबित करने के लिए भी अजीबोगरीब तर्क दे रहा है। ट्रंप के प्रशासन ने अदालती दस्तावेजों में चेतावनी दी है कि भारत सहित अन्य देशों पर टैरिफ कम करने से अमेरिका को दूसरे देशों से बदले का सामना करना पड़ सकता है। यह भी कहा गया है कि इससे दुनिया में शांति स्थापित करने की कोशिशों को भी झटका लगेगा। वहीं अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में एक अपील में, सॉलिसिटर जनरल जॉन सॉयर ने जजों से कहा है कि यूक्रेन जंग में शांति बनाए रखने के लिए भारत पर टैरिफ लगाना बहुत जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला अमेरिकी सत्ता संतुलन की बड़ी परीक्षा होगी। करीब 750 अरब डॉलर के टैरिफ दांव पर लगे हैं। अगर अदालत ट्रंप के पक्ष में जाती है तो राष्ट्रपति की आर्थिक शक्तियाँ बहुत बढ़ जाएंगी। लेकिन अगर फैसला खिलाफ आता है तो अरबों डॉलर के टैरिफ वापस करने पड़ सकते हैं और अमेरिका की व्यापार नीति और आपातकालीन शक्तियों की परिभाषा बदल सकती है। साथ ही ट्रम्प के घमंड की किरकिरी होगी सो अलग।
सितंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट ने यह तय नहीं किया है कि वह इस मामले की सुनवाई करेगा या नहीं। लेकिन दोनों पक्ष मानते हैं कि जल्द से जल्द समाधान जरूरी है। इसीलिए पूरा राजनीतिक और कानूनी जगत अगली कार्रवाई का इंतजार कर रहा है।
