राजस्थान का बीकानेर सिर्फ अपने किलों, हवेलियों और रेगिस्तानी संस्कृति के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां कई ऐसे ऐतिहासिक धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जिनसे जुड़ी कहानियां आज भी लोगों को हैरान करती हैं। इन्हीं में से एक है Bhandasar Jain Temple। करीब 550 साल पुराने इस जैन मंदिर को बीकानेर के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण स्मारकों में गिना जाता है। मंदिर भगवान सुमतिनाथ, यानी जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर, को समर्पित है। राजस्थान पर्यटन भी इसे 15वीं सदी का मंदिर और बीकानेर के पुराने स्मारकों में शामिल करता है।
लेकिन Bhandasar Jain Temple की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी खूबसूरत वास्तुकला से ज्यादा उस कहानी को लेकर होती है, जिसके अनुसार इसके निर्माण में पानी की जगह करीब 40,000 किलोग्राम घी का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि इस दावे को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय स्थानीय मान्यता और किंवदंती के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
Bhandasar Jain Temple का इतिहास करीब 550 साल पुराना
Bhandasar Jain Temple का निर्माण 15वीं सदी में कराया गया था। उपलब्ध ऐतिहासिक और हेरिटेज स्रोतों के अनुसार बीकानेर के व्यापारी भंडासा ओसवाल ने वर्ष 1468 में मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था। मंदिर भगवान सुमतिनाथ को समर्पित किया गया। कुछ स्रोतों के अनुसार भंडासा ओसवाल की मृत्यु के बाद निर्माण कार्य आगे जारी रहा और मंदिर वर्ष 1514 में पूरा हुआ। यानी वर्तमान समय में इस मंदिर का इतिहास लगभग साढ़े पांच सदियों से भी ज्यादा पुराना है। इसी वजह से यह बीकानेर की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। हालांकि कुछ पर्यटन स्रोत मंदिर के निर्माण को 1554 तक पूरा होने की बात भी बताते हैं। इसलिए निर्माण की अंतिम तारीख को लेकर स्रोतों में अंतर दिखाई देता है। ऐसे में 1468 में निर्माण शुरू होने और 15वीं-16वीं सदी के बीच मंदिर के पूरा होने की बात अधिक सावधानी से कही जा सकती है।
40 हजार किलो घी वाली कहानी क्या है?
अब बात उस दावे की, जिसने Bhandasar Jain Temple को देशभर में अलग पहचान दी है। स्थानीय परंपरा के अनुसार जब मंदिर का निर्माण कराया जा रहा था, उस समय पानी की कमी बड़ी समस्या थी। ऐसे में निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले मोर्टार में पानी की जगह घी का इस्तेमाल किए जाने की कहानी प्रचलित है। कई स्रोतों में दावा किया गया है कि मंदिर की नींव या निर्माण में करीब 40,000 किलोग्राम शुद्ध घी इस्तेमाल हुआ था। वहीं पुराने हेरिटेज स्रोतों में कहानी का एक अलग संस्करण मिलता है। उसमें 40,000 किलोग्राम के बजाय 40 से अधिक बैरल घी इस्तेमाल होने की बात कही गई है। एक अन्य परंपरा में मंदिर की नींव में शुद्ध घी और सूखे नारियल भरने की बात भी मिलती है। इसलिए 40,000 किलो घी वाली बात को रिपोर्ट करते समय इसे “कहा जाता है” या “स्थानीय मान्यता के अनुसार” कहना ज्यादा उचित है।
पानी की कमी से जुड़ी है मंदिर की यह मान्यता
बीकानेर थार मरुस्थल के क्षेत्र में स्थित है और पानी की कमी यहां के इतिहास और जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है। इसी पृष्ठभूमि में Bhandasar Jain Temple से जुड़ी घी वाली कहानी को देखा जाता है। लोकप्रिय कथा के अनुसार निर्माण के दौरान पानी उपलब्ध न होने की वजह से घी का इस्तेमाल किया गया। यह कहानी मंदिर के प्रति लोगों की धार्मिक आस्था और उस समय के निर्माण कौशल को लेकर कई सवाल भी खड़े करती है। हालांकि आधुनिक वैज्ञानिक या पुरातात्विक अध्ययन से यह निर्णायक रूप से प्रमाणित नहीं है कि मंदिर की पूरी नींव या मोर्टार वास्तव में 40,000 किलो घी से बनाया गया था। इसलिए इस कहानी को इतिहास और लोकविश्वास के बीच मौजूद एक दिलचस्प परंपरा के रूप में समझना बेहतर है।
गर्मी में घी निकलने का दावा कितना सच है?
Bhandasar Jain Temple से जुड़ी दूसरी चर्चित मान्यता और भी दिलचस्प है। स्थानीय लोगों के बीच कहा जाता है कि जब बीकानेर में गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है, तब मंदिर के कुछ हिस्सों या फर्श से घी जैसी चिकनाई दिखाई देती है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले दिनों में पत्थरों पर बेहद हल्के तैलीय निशान दिखाई देने की बात कही जाती है। स्थानीय लोग इसे सदियों पहले इस्तेमाल किए गए घी के अवशेषों से जोड़ते हैं। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। अभी तक ऐसा कोई निर्णायक वैज्ञानिक अध्ययन सामने नहीं है जो यह साबित करे कि दिखाई देने वाला पदार्थ वास्तव में 500 साल से ज्यादा पुराना वही घी है। इसलिए इसे स्थानीय मान्यता के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
24 तीर्थंकरों से जुड़ी कलाकृतियां भी खास
Bhandasar Jain Temple के अंदर जैन धर्म की कलात्मक परंपरा को बेहद खूबसूरती से प्रदर्शित किया गया है। मंदिर की सजावट में जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों से संबंधित चित्र और कलात्मक प्रस्तुतियां दिखाई देती हैं। दीवारों और छतों पर बनी पेंटिंग्स, फूल-पत्तियों की डिजाइन, नक्काशीदार स्तंभ और सुनहरी सजावट मंदिर के अंदर एक अलग ही दृश्य पैदा करते हैं। इसी वजह से यह जगह सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि कला और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान सुमतिनाथ की प्रतिमा स्थापित है। सुमतिनाथ जैन धर्म के पांचवें तीर्थंकर माने जाते हैं। मंदिर की धार्मिक पहचान इसी वजह से जैन समुदाय के लिए विशेष महत्व रखती है।
