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Reading: भोपाल का नाम बदलने की उठी मांग, किसके आदेश से भोजपाल से भोपाल में बदला गया था शहर का नाम?
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भोपाल का नाम बदलने की उठी मांग, किसके आदेश से भोजपाल से भोपाल में बदला गया था शहर का नाम?

भोपाल का असली नाम “भोजपाल” ही था

Last updated: अगस्त 26, 2025 2:47 अपराह्न
By Rajneesh 11 महीना पहले
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4 Min Read
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भोपाल की सड़कों पर शनिवार को एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। “भोजपाल मित्र परिषद” के बैनर तले लोग जुटे और उन्होंने मांग उठाई कि राजधानी का नाम उसके असली इतिहास के अनुरूप “भोपाल” से बदलकर “भोजपाल” किया जाए। नारों में बार-बार गूंज रहा था “राजा भोज का शहर, भोजपाल हमारा”। यह सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं है, बल्कि शहर की उस स्मृति को फिर से जीवित करने की कोशिश है जो धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई है।

भोपाल का असली नाम “भोजपाल” ही था। यह नाम परमार वंश के महान शासक राजा भोज (1010 – 1055 ईस्वी) की याद दिलाता है। राजा भोज को विद्वता, स्थापत्य और जल प्रबंधन का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने अपने राज्य की प्यास बुझाने के लिए यहाँ की नदियों पर बाँध (पाल) बनवाए और एक विशाल झील का निर्माण कराया। यह झील आज भी “बड़ा तालाब” या “भोजताल” के नाम से जानी जाती है। “भोजपाल” नाम के पीछे यही कहानी में ‘भोज’ राजा भोज के नाम से आया और ‘पाल’ बाँध के पर्याय से आया। यानी वह शहर जो राजा भोज की झील और बाँधों पर बसा हो।

समय बीता, शासक बदले, और भाषाएँ भी। 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच जब मुस्लिम शासकों का प्रभाव बढ़ा, तो फारसी और अरबी बोली में “भोजपाल” धीरे-धीरे “भोपल” और फिर “भोपाल” बन गया।

18वीं शताब्दी में जब ‘दोसत मोहम्मद ख़ान’ ने यहाँ अपनी रियासत कायम की और भोपाल राज्य की नींव रखी, तब “भोपाल” नाम आधिकारिक रूप से प्रचलन में आया। यही नाम आगे चलकर नवाबों की रियासत, फिर ब्रिटिश राज और आखिरकार स्वतंत्र भारत तक पहुँच गया। साल 1956 में जब भोपाल, मध्यप्रदेश की राजधानी बना, तब तक “भोजपाल” इतिहास की किताबों और लोककथाओं में ही सीमित रह गया। यानी यह बदलाव किसी एक शासक के आदेश से नहीं, बल्कि सदियों के उच्चारण और भाषा के प्रभाव से हुआ था।

आज जब “भोजपाल मित्र परिषद” जैसे संगठन सड़कों पर उतरते हैं, तो उनके पीछे सिर्फ नाम बदलने की जिद नहीं होती। उनके अनुसार, “भोपाल” नाम शहर की उस असली पहचान और गौरव को पूरी तरह नहीं दर्शाता जो राजा भोज से जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि “भोजपाल” नाम अपनाने से शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को सम्मान मिलेगा।

दरअसल, यह मांग एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जहाँ भारत के कई हिस्सों में शहरों और स्थानों के नाम उनके पूर्व-औपनिवेशिक या पूर्व-इस्लामी स्वरूप में लौटाने की कोशिश की जा रही है।

भोपाल का नाम बदलने की बहस हमें एक गहरे सवाल की ओर ले जाती है कि, क्या किसी शहर की पहचान उसके नाम से जुड़ी होती है, या उसकी संस्कृति, लोग और समय से? भोजपाल हमें 11वीं शताब्दी की उस स्मृति से जोड़ता है जब राजा भोज ने तालाब बनाकर जीवन को सरल और समृद्ध बनाया। दोनों ही नाम इस शहर की कहानी हैं। फर्क इतना है कि एक नाम इतिहास की जड़ों की याद दिलाता है और दूसरा वर्तमान की पहचान को ढो रहा है।

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TAGGED: Bhojpal Mitra Parishad, bhopal, city of bhoj, Indian history, madhya pradesh, raja bhoj, thefourth, thefourthindia
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