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जैतगढ़ का रहस्यमय मां जयंती मंदिर – पिंडी रूप में विराजमान हैं देवी

धरती से प्रकट हुई शक्ति, जो आज भी आस्था का केंद्र बनी हुई है।

Last updated: दिसम्बर 1, 2025 4:26 अपराह्न
By itspixeldot 11 महीना पहले
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5 Min Read
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मध्य प्रदेश की धरती न केवल भगवान शिव के ज्योर्तिलिंगों से पवित्र मानी जाती है, बल्कि यहां देवी शक्ति के अनोखे स्वरूप भी विद्यमान हैं। इंदौर के समीप जैतगढ़ में स्थित मां जयंती मंदिर ऐसा ही एक दिव्य स्थल है, जहां देवी स्वयंभू पिंडी रूप में विराजमान हैं। पहाड़ियों और चोरल नदी की प्राकृतिक गोद में बसा यह मंदिर श्रद्धालुओं को अध्यात्म और रहस्य से भरपूर अनुभूति कराता है।

भगवान शिव को पिंडी के रूप में पूजा जाता है, ज्योर्तिलिंग सहित सनातन मान्यताओं के ऐसे केंद्र हैं जहां भगवान के पिंडी रूप स्वयंभू अवतरित हुए हैं। मगर क्या कभी सुना है कि देवी भी पिंडी रूप में पूजी जाती हैं? देवी के पिंडी रूप में दर्शन मध्य प्रदेश में ही ज्योर्तिलिंग ओंकारेश्वर के समीप जैतगढ़ में होते हैं। यहां प्राकृति की गोद में मां जयंती का मंदिर है।

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इंदौर के समीप बड़ावह सिद्धवरकूट रोड पर चोरल नदी के किनारे जैतगढ़ का किला है। किले के पास ही पहाड़ी में गुफा है, जिसमें मां जयंती का मंदिर स्थित है। यहीं पर पिंडी स्वरूप में देवी के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि यह स्वयंभू रूप महालक्ष्मी, महाकाली, महासरस्वती और मां योगिनी के संयुक्त रूप का प्रतीक है। पिंडी आधी पहाड़ में धंसी हुई हैं, और केवल छोटा-सा हिस्सा भक्तों को दर्शन देता है।

स्थानीय पुजारी रामस्वरूप शर्मा बताते हैं कि जब किसी मंदिर में मूर्ति को प्राण प्रतिष्ठा के बाद स्थापित किया जाता है, तो उसे मंदिर के मध्य में रखा जाता है। लेकिन मां जयंती स्वयं अवतरित हुई हैं, इसलिए वे मंदिर के बीचोबीच नहीं हैं। भक्तों की सुविधा के लिए मां की एक मूर्ति बनाकर स्थापित की गई है, जिसकी स्थापना लगभग 500 वर्ष पहले की मानी जाती है। कहा जाता है कि जैतगढ़ के किले और मंदिर का निर्माण सन् 1500 के आसपास तोमर राजा राणा हमीरसिंह ने कराया था, जिनकी कुलदेवी मां जयंती थीं।

प्राचीन मंदिर होने से यहां कई पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हुई हैं। स्थानीय किवदंतियों के अनुसार स्थापना के समय मां के चेहरे के भाव विकराल थे, लेकिन भक्तों के आग्रह पर बाद में उन्होंने अपना रूप बदला और अब सौम्य रूप में दर्शन देती हैं।

यह मंदिर चोरल नदी के किनारे स्थित है। लगभग पचास वर्ष पहले तक यहां कोई पुल नहीं था, इसलिए श्रद्धालुओं को नदी पार करके दर्शन करने जाना पड़ता था। बरसात के मौसम में नदी के उफान पर रहने से कई दिनों तक मां के दर्शन संभव नहीं हो पाते थे। पुल बनने के बाद श्रद्धालु अब आसानी से मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

मां जयंती मंदिर के पास प्राचीन भैरवनाथ और बाबा बजरंगबली के भी मंदिर हैं। वहीं थोड़ी दूरी पर कश्यप ऋषि का आश्रम है। एक मान्यता के अनुसार ऋषि कश्यप के पुत्र करजेश्वर ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। कुछ ही किलोमीटर दूर ऋषि च्यवन का आश्रम भी स्थित है, जहां विभिन्न औषधीय पौधे पाए जाते हैं।

थोड़ा और आगे बढ़ने पर कोटेश्वर महादेव मंदिर नर्मदा तट पर मिलता है, जिसका निर्माण देवी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। पहले यहां तक पहुंचने के लिए कच्चा रास्ता था, लेकिन अब मार्ग सुगम हो चुका है।

मां जयंती मंदिर के समीप एक सुंदर झरना भी है। यह क्षेत्र निमाड़ के गर्म मौसम के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन अद्भुत बात यह है कि गर्मियों में जब आसपास के झरने और जल स्रोत सूख जाते हैं, तब भी यहां जल की धारा अविरल बहती रहती है। इसे दैविक चमत्कार भी माना जाता है।

दोनों नवरात्रियों में यहां भव्य मेला लगता है। सुबह छह बजे माता का श्रृंगार और आरती होती है, दोपहर 11 बजे भोग लगाया जाता है, और रात साढ़े आठ बजे शयन आरती होती है।

यह स्थल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक महत्व का अद्भुत संगम है। फिर भी यह अभी भी अनजान सा बना हुआ है। धार्मिक यात्री अक्सर ओंकारेश्वर तक तो आते हैं, लेकिन जैतगढ़ के इस दिव्य मंदिर से अनभिज्ञ रह जाते हैं। कभी समय निकालकर यहां आइए, मां जयंती के साक्षात दर्शन और चोरल की ठंडी लहरों का अनुभव आपको अध्यात्म और शांति दोनों का आशीर्वाद देगा।

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