प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पूर्वोत्तर यात्रा ने इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा और विवाद को जन्म दिया है। जहाँ एक ओर बीजेपी इसे विकास और शांति की पहल बता रही है, वहीं असम और मणिपुर की सड़कों पर लोग गुस्से में हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर क्यों जनता प्रधानमंत्री की मौजूदगी को राहत नहीं बल्कि आक्रोश के रूप में देख रही है?
पहचान और अधिकार की लड़ाई
असम में मोरान समुदाय लंबे समय से अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। उनकी मुख्य माँग है कि उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मिले। उनका कहना है कि बिना इस दर्जे के उनकी जमीन, संस्कृति और भविष्य असुरक्षित है। PM मोदी की यात्रा से ठीक पहले हज़ारों मोरान लोग टिनसुकिया की सड़कों पर उतरे। उनके हाथों में पोस्टर थे और आवाज़ में गुस्सा, “हम कब तक इंतज़ार करेंगे?”
इसके साथ ही, असम में एक और बड़ा मुद्दा है, घुसपैठ और जनसंख्या संतुलन। स्थानीय लोग मानते हैं कि बाहर से आए लोगों के कारण उनकी संस्कृति और पहचान पर खतरा मंडरा रहा है। PM मोदी ने भाषणों में इसका ज़िक्र किया, लेकिन जनता कहती है, “बयान से पेट नहीं भरता, हमें कार्रवाई चाहिए।”
मणिपुर: जख्मों पर नमक
असम की नाराज़गी जहाँ अधिकार और पहचान पर है, वहीं मणिपुर की कहानी कहीं ज़्यादा दर्दनाक है। मई 2023 से यहाँ मेइतेई और कुकि-जो समुदायों के बीच हिंसा ने राज्य को तहस-नहस कर दिया। सैकड़ों लोग मारे गए, हज़ारों परिवार अपने घर छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हो गए, महिलाओं का अपमान किया गया, गाँव जला दिए गए, मंदिर और चर्च तक तोड़े दिए गए।
लेकिन यह पहली बार नहीं जब मणिपुर जल रहा हो। 2004 का मनोरमा कांड आज भी यहाँ के लोगों को याद है, जब एक युवती की मौत के खिलाफ महिलाओं ने इम्फाल में नग्न प्रदर्शन किया था। 2015 में भूमि कानूनों के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए, जिनमें कई लोगों की जान गई। अलग-अलग समुदायों के बीच संघर्ष दशकों से यहाँ की ज़िंदगी का हिस्सा रहे हैं। यानी मणिपुर का दर्द नया नहीं है, लेकिन हाल की हिंसा ने इन जख्मों को और गहरा कर दिया है।
“बहुत देर हो गई, अब बातें नहीं चलेंगी”
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दौरे में शांति की अपील की और विकास परियोजनाओं की घोषणा की। उन्होंने कहा कि “पहाड़ और घाटी को साथ आना होगा।” लेकिन मणिपुर की जनता का सवाल है, “हमारे टूटे घरों का क्या? हमारे मरे हुए अपनों का क्या? अब हमें सुरक्षा और न्याय चाहिए, केवल भाषण नहीं।”
इम्फाल की सड़कों पर छात्रों ने नारे लगाए, “Go Back Modi।” हिंसा को ढाई साल हो गए, इतने समय बाद प्रधानमंत्री का पहुँचना लोगों को “बहुत देर से आई सांत्वना” लगता है। स्टेडियम, सड़कें और योजनाएँ अच्छी हैं, लेकिन जब हज़ारों लोग राहत शिविरों में असुरक्षित हैं, तो ये योजनाएँ खोखली लगती हैं।
जनता की असली माँग
लोगों की नाराज़गी इस बात से है कि उनकी आवाज़ को बार-बार अनसुना किया गया। असम और मणिपुर की जनता चाहती है कि हिंसा के पीड़ितों को सुरक्षा और न्याय मिले और विस्थापित परिवार अपने घरों में सुरक्षित लौट सकें। असम की जनजातियाँ अपने अधिकार पाएँ और मणिपुर की विविधता को सम्मान मिले। अब केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस और तुरंत कार्रवाई हो।
प्रधानमंत्री की यात्रा ने असम और मणिपुर में उम्मीदें जगाने की बजाय सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता कह रही है कि “अगर हमारी पीड़ा नहीं सुनी जाएगी, तो यह दौरा सिर्फ़ एक दिखावा रह जाएगा।”
पूर्वोत्तर की आवाज़ साफ है, यहाँ लोग अब और इंतज़ार नहीं करना चाहते। उन्हें चाहिए न्याय, सुरक्षा और सम्मान। और जब तक यह नहीं मिलेगा, मोदी या कोई भी नेता, जनता की नाराज़गी का सामना करता ही रहेगा।
