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Basant Panchami
Fourth Special

Basant Panchami और वाग्देवी की विरासत जो आज भी भारत से दूर है

धार की विरासत, लंदन की दीवारों में

Last updated: जनवरी 23, 2026 2:09 अपराह्न
By itspixeldot 8 महीना पहले
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3 Min Read
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आज देशभर में Basant Panchami का पर्व मनाया जा रहा है। विद्या, वाणी और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा हो रही है। स्कूलों, मंदिरों और शिक्षण संस्थानों में पीले वस्त्रों और पुष्पों के साथ ज्ञान की आराधना की जा रही है। लेकिन इसी Basant Panchami और वाग्देवी की विरासत जो आज भी भारत से दूर है पर मध्य प्रदेश के धार से जुड़ा एक सवाल फिर सामने आ खड़ा हुआ है। वह सवाल है वाग्देवी की उस प्राचीन मूर्ति का, जो भारत में नहीं बल्कि आज लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में मौजूद है।

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कौन हैं वाग्देवी और क्यों है यह प्रतिमा खास

वाग्देवी यानी वाणी और ज्ञान की देवी। इतिहासकारों के अनुसार वाग्देवी को ही कालांतर में सरस्वती के रूप में जाना गया। धार, जो कभी परमार वंश की राजधानी और राजा भोज का सांस्कृतिक केंद्र था, वहीं से इस प्राचीन प्रतिमा का संबंध जुड़ा है। राजा भोज का काल मध्य भारत में शिक्षा, साहित्य और संस्कृत का स्वर्णकाल माना जाता है। यही कारण है कि धार को विद्या की भूमि के रूप में जाना गया।

इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि यह मूर्ति लगभग 1034 ईस्वी के आसपास बनाई गई थी, यानी आज से करीब एक हजार साल पहले। यह प्रतिमा सफेद संगमरमर से निर्मित है और इसके नीचे संस्कृत में शिलालेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख सीधे तौर पर राजा भोज के समय और उस दौर की बौद्धिक परंपरा की ओर इशारा करता है। यह केवल एक धार्मिक प्रतिमा नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत की शिक्षा और संस्कृति का ऐतिहासिक प्रमाण भी है।

ब्रिटिश म्यूजियम तक कैसे पहुँची वाग्देवी

लेकिन इस मूर्ति की यात्रा भारत में पूरी नहीं हो सकी। वर्ष 1875 में धार के पुराने खंडहरों के बीच यह प्रतिमा दोबारा सामने आई। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1886 के आसपास एक ब्रिटिश अधिकारी इस मूर्ति को भारत से इंग्लैंड ले गया। इसके बाद 1909 में इस प्रतिमा को ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रह में शामिल कर लिया गया। तब से लेकर आज तक वाग्देवी की यह मूर्ति भारत से बाहर ही है।

इतिहासकारों का मानना है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से बड़ी संख्या में कलाकृतियां, मूर्तियां और ऐतिहासिक धरोहरें बाहर ले जाई गईं। इन्हें कभी शोध, कभी संरक्षण और कभी संग्रह के नाम पर यूरोप पहुंचाया गया। वाग्देवी की मूर्ति भी उसी औपनिवेशिक प्रक्रिया का हिस्सा मानी जाती है। यह अकेली धरोहर नहीं है। कोहिनूर हीरा, अमरावती की मूर्तियां और कई प्राचीन भारतीय कलाकृतियां आज भी विदेशी संग्रहालयों में मौजूद हैं।

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TAGGED: basant panchami, goddess of saraswati, indian culture, indian heritage, Indian history, saraswati, thefourth, thefourthindia, vagdevi
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