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Reading: इंदौर में अनंत चतुर्दशी पर निकला झांकियों का काफिला, 100 साल पुरानी है परंपरा
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Religion

इंदौर में अनंत चतुर्दशी पर निकला झांकियों का काफिला, 100 साल पुरानी है परंपरा

इंदौर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है।

Last updated: सितम्बर 18, 2024 5:25 अपराह्न
By Divya 1 वर्ष पहले
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8 Min Read
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मध्य प्रदेश का इंदौर, जिसे कभी ‘मिलो का शहर’ कहा जाता था। इंदौर अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है। इसी धरोहर का एक अभिन्न हिस्सा है, अनंत चतुर्दशी पर निकलने वाली भव्य झांकियों की परंपरा, जिसे कल यानी 17 सितंबर को 101 साल पूरे हो चुके हैं। इंदौर में अनंत चतुर्दशी के अवसर पर झांकियों की यह परंपरा 1923 में हुकुमचंद मिल के श्रमिकों द्वारा शुरू की गई थी। तब से लेकर अब तक यह परंपरा निरंतर चलती आ रही है। आपको बता दे कि, झांकियों का निर्माण एक महीने पहले ही शुरू हो जाता है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक थीम को दर्शाया जाता है। वहीं इस भव्य जुलूस में केवल उन झांकियों को शामिल किया गया था, जिन्हें प्रशासन से उचित मंजूरी प्राप्त थी। इस झांकी को बनाने में मिल के मजदूरों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। मजदूरों ने अपना एक दिन का वेतन झांकी निर्माण के लिए दान किया। यह परंपरा इतनी मजबूत थी कि, हुकुमचंद मिल के बंद होने के बाद भी, मिल मजदूरों ने इस परंपरा को जीवित रखा। इस साल की अनंत चतुर्दशी पर इस 26 झांकियां शामिल की गईं थी। इनमें 15 झांकी मिलों की है और 11 झांकी शासकीय है जो कि, अलग-अलग थीम पर बनाई गई थीं।

सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक

अनंत चतुर्दशी पर निकलने वाली ये झांकियां न केवल धार्मिक आयोजन हैं, बल्कि ये इंदौर की सांस्कृतिक धरोहर और मजदूरों की एकजुटता का प्रतीक भी हैं। सेठ हुकुमचंद की शुरू की गई यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और भव्यता के साथ निभाई जाती है। इंदौर के लोग हर साल इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बनते हैं और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखते हैं। इंदौर की झांकियों की यह परंपरा समय के साथ और भी भव्य और आकर्षक बनती जा रही है। सेठ हुकुमचंद की इस विरासत को इंदौर के लोग बड़े गर्व के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। यह परंपरा न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह इंदौर की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।

18 सितंबर से झांकियां तीन दिन तक मिलों में ही खड़ी रहेंगी

इस चल समारोह की शुरुआत भंडारी ब्रिज के पास से हुई थी इसमें सबसे आगे खजराना गणेश मंदिर की झांकी थी। उसके बाद इंदौर विकास प्राधिकरण, फिर नगर निगम, होप टेक्सटाईल (भण्डारी मिल), कल्याण मिल, मालवा मिल, हुकुचंद मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल, स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी, जय हरसिद्धी माँ सेवा समिति और शास्त्री कार्नर नवयुवक मंडल छोटा गणपति मंदिर मल्हारगंज की झिलमिलाती झांकियां शामिल हैं। झांकियों का रूट 6 किलोमीटर तक लम्बा था। रात करीब 10.30 बजे सारी झांकियां राजवाड़ा पहुंची। यहां मप्र सरकार में कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी झांकी में शामिल हुए। वहीं, 18 सितंबर से झांकियां तीन दिन तक मिलों में ही खड़ी रहेंगी, जहां लोग उन्हें देख सकेंगे।

आइए जानते है कहा-कहा से आई थी झांकियां और कितने साल हो गए है इन झांकियों को निकलते हुऐ?

पहली झांकी हुक्मचंद मिल – 101 वर्ष

पहली झांकी – सत्यम-शिवम-सुंदरम पर आधारित थी। इसमें कलाकारी के रूप में मंदिर बनाए गए थे।
दूसरी झांकी – कृष्ण जन्मोत्सव पर आधारित थी। इसमें नंदबाबा के गांव में कृष्ण जन्मोत्सव को दिखाया गया था।
तीसरी झांकी – श्रीकृष्ण और इंद्र युद्ध पर आधारित थी। इसमें पारिजात वृक्ष, विशाल हाथी पर इंद्र व गरुड़ पर कृष्ण सवार थे।

दूसरी झांकी मालवा मिल का जुलूस – 90वां वर्ष

पहली झांकी – सीता स्वयंवर पर आधारित थीं। इसमें प्रभु श्रीराम माता सीता वस्त्र धारण करते हुए प्रकट हुए थे।
दूसरी झांकी – कृष्ण लीला पर आधारित थी। इसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का चित्रण किया गया था।
तीसरी झांकी – इसमें भारत माता का पिछला ध्वज चक्र दिखाई दिया।

तीसरी झांकी हॉप टेक्सटाइल्स – 75वाँ वर्ष

पहली झांकी – गणेशजी पर आधारित थीं। इसमें मां पार्वती द्वारा बाल गणेश को वस्त्र पहनाकर दिखाया गया था।
दूसरी झांकी – शिव तांडव पर आधारित थी। इसमें यज्ञाग्नि में माता सती के दाह के बाद शिव का रौद्र रूप दिखाया गया था।

चौथी झांकी कल्याण मिल – 95वाँ वर्ष

पहली झांकी – इसमें माता कालका द्वारा रक्तबीज का वध और माता दुर्गा के देवताओं द्वारा की गई मूर्तियाँ प्रदर्शित की गई थीं।
दूसरी झांकी – राष्ट्रीय विषय एकता-अखंडता यानी, हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया जाता गया था। दूसरे भाग में हंसी-खुशी से झूलती हुई लाडली बहनों को दिखाया गया है।

पांचवीं झांकी स्वदेशी मिल – 95वाँ वर्ष

पहली झांकी – हनुमानजी पर आधारित थी। इसमें अहिरावण वध में प्रभु राम और लक्ष्मण को दर्शाया गया है।
दूसरी झांकी – मोबाइल पर आधारित थी। इसमें मोबाइल के दुष्परिणाम बताए गए थे।
तीसरी झांकी – कुम्भकर्ण पर आधारित थी। इसमें 6 महीने तक सोने वाले कुंभकर्ण को जगाते हुए दिखाया गया था।

छटवी झांकी प्रिंस मिल – 89वां वर्ष

पहली झांकी – मोटू-पतलू पर आधारित थी। इसमें मोटू-पतलू के अलग-अलग कार्टून दिखाए गए थे।
दूसरी झांकी – वासुकी नाग और गरुड़ युद्ध पर आधारित थीं। इसमें समुद्र तट पर वासुकी नाग को ले जाने का चित्र दिखाया गया था।

सातवी झांकी बी.ए. – 27वाँ वर्ष

पहली झांकी – विकास पर आधारित थी। इसमें कोचिंग पार्क, स्विमिंग पुल, आयएस बी.टी., प्लांटओवर आदि शामिल थे।
दूसरी झांकी – हनुमानजी पर आधारित थी। 25 फीट के स्टार हनुमानजी संजीवनी प्लेस में दिखाई दिए थे।
तीसरी झांकी – श्रीकृष्ण पर आधारित थी। इसमें वह भीष्म पितामह पर प्रहार करते हुए दिखाई दिए।

आठवीं झांकी इंदौर नगर निगम – 28वाँ वर्ष

पहली झांकी – अहिल्या माता की जयंती पर आधारित थी। पालकी में अहिल्या माता के दर्शन कराए गए।
दूसरी झांकी – अभिमन्यु पर आधारित थी इसमें सुरेखा हरण का चित्रण किया गया था।
तीसरी झांकी – डिजिटल विषय पर आधारित थी। इसमें ऐप, पोर्टल आदि आर्किटेक्चर की जानकारी दी गई थीं।

नौवीं झांकी खजराना मंदिर – 19वाँ वर्ष

पहली झांकी – गणेशजी पर आधारित थी। इसमें गणेशजी अपने माता-पिता की मूर्तियों को देखते हुए नज़र आए।
दूसरी झांकी – सौर ऊर्जा पर आधारित थी। इसमें सौर ऊर्जा योजना और उसके लाभों के बारे में बताया गया था।

हुकुमचंद मिल की झांकी को मिला पहला पुरस्कार

इस साल का सबसे पुराना हुकुमचंद मिल की झांकी को पहला पुरस्कार मिला हैं। इसमें तीन झांकियां थीं, जिनमें श्रीकृष्ण और इंद्र के युद्ध की हुनकियों को विशेष रूप से उद्धृत किया गया था। दूसरे स्थान पर प्रिंस एवं कल्याण मिल की झांकियां हैं। प्रिंस मिल की झांकी में मोटू पतलू की जोड़ी थी और कल्याण मिल की झांकी ने राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया। वहीं, तीसरे स्थान पर मालवा मिल की झांकी रही, जिसमें श्रीकृष्ण द्वारा माखन चोरी की घटना दिखाई गई थी।

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