हाल ही में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने गैर-मराठी भाषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी, जिस पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जवाब दिया कि मराठी भाषा का प्रचार सही है, लेकिन कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा। यह बयान कोई पहली बार नहीं आया है। महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ हमले पहले भी हो चुके हैं। सवाल यह उठता है कि अगर हर राज्य इस तरह की असहिष्णुता दिखाने लगे, तो क्या भारत ‘संविधानिक संघीय गणराज्य’ से ‘विभाजित राज्यों के समूह’ में बदल जाएगा?
भारत विविधता में एकता के सिद्धांत पर बना है। संविधान के अनुसार, कोई भी भारतीय नागरिक देश के किसी भी हिस्से में जाकर बस सकता है, काम कर सकता है और स्वतंत्र रूप से रह सकता है। लेकिन जब क्षेत्रीय पार्टियां वोट बैंक की राजनीति के लिए स्थानीय बनाम बाहरी का विवाद खड़ा करती हैं, तो यह देश की अखंडता पर सीधा बुरा असर डालता है।
एक तरफ तमिलनाडु केवल तमिल बोलने वाले वहां रह सकते हैं, कल्पना कीजिए कि पंजाब में गैर-पंजाबी बोली जाने पर पाबंदी लग जाए, गुजरात में ‘गैर-गुजराती’ व्यवसायों को निशाना बनाया जाए, तो क्या भारत में रहना संभव होगा? एक राष्ट्र के रूप में हम केवल एक राजनीतिक नक्शा भर रह जाएंगे, जबकि जमीनी स्तर पर देश टूट जाएगा।
मराठी, तमिल, बंगाली, पंजाबी, हिन्दी और अन्य सभी भाषा की अपनी महत्ता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि किसी और भाषा या समुदाय के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया जाए। भाषा स्वाभाविक रूप से सीखी जाती है, न कि भय के कारण थोपी जाती है।
अनुच्छेद 19(1)(e) हर भारतीय को देश में कहीं भी बसने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 29 हर नागरिक को अपनी भाषा और संस्कृति बनाए रखने की स्वतंत्रता देता है। स्टालिन, राज ठाकरे या किसी भी अन्य नेता के बयान संविधान के खिलाफ जाते हैं और राष्ट्र को कमजोर करने का काम करते हैं।
हर चुनाव से पहले क्षेत्रीयता और भाषा की राजनीति तेज हो जाती है। MNS जैसी पार्टियां जब मुख्यधारा की राजनीति में कमजोर पड़ती हैं, तो मराठी मानुष का मुद्दा उठाकर अपनी राजनीति को पुनर्जीवित करने की कोशिश करती हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या आम जनता इस जाल में फिर से फंसेगी?
समाधान क्या है? इसका सीधा जवाब तो नहीं है लेकिन कुछ चीजें ज़रूर हो सकती है जैसे – किसी भी भाषा, धर्म या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव को कानून बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। सरकारों को स्थानीय भाषाओं का प्रचार करना चाहिए, लेकिन यह स्वाभाविक तरीके से होना चाहिए, न कि हिंसा के जरिए। भाषा की राजनीति करने की बजाय सरकारों को नौकरियों, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। भारतीयों को पहले ‘भारतीय’ बनना चाहिए, फिर मराठी, तमिल, बंगाली या पंजाबी।
भाषा और क्षेत्रीय पहचान पर गर्व करना स्वाभाविक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम एक राष्ट्र के रूप में बंट जाएं। यदि हर राज्य महाराष्ट्र की राह पर चला, तो भारत एक अखंड राष्ट्र नहीं रहेगा, बल्कि टुकड़ों में बंटा हुआ, केवल मानचित्र में सिमटा हुआ एक समुह बन कर रह जायेगा। यह हमें तय करना है कि हम एकजुट भारत चाहते हैं या फिर ‘क्षेत्रीय दुश्मनी’ का ऐसा जाल जहां हम खुद के लोगों को ही पराया मानने लगें।