By using this site, you agree to the Privacy Policy
Accept
March 7, 2026
The Fourth
  • World
  • India
  • Politics
  • Sports
  • Business
  • Tech
  • Fourth Special
  • Lifestyle
  • Health
  • More
    • Travel
    • Education
    • Science
    • Religion
    • Books
    • Entertainment
    • Food
    • Music
Reading: जातिगत जनगणना पर सरकार की मुहर लेकिन क्या वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की पहचान होगी या सिर्फ राजनीति?
Font ResizerAa
The FourthThe Fourth
Search
  • World
  • India
  • Politics
  • Sports
  • Business
  • Tech
  • Fourth Special
  • Lifestyle
  • Health
  • More
    • Travel
    • Education
    • Science
    • Religion
    • Books
    • Entertainment
    • Food
    • Music
Follow US
WhatsApp Image 2025 05 01 at 2.42.56 PM - The Fourth
India

जातिगत जनगणना पर सरकार की मुहर लेकिन क्या वास्तविक सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की पहचान होगी या सिर्फ राजनीति?

जातिगत जनगणना की मांग कई दशक पुरानी है

Last updated: मई 1, 2025 2:50 अपराह्न
By Rajneesh 10 महीना पहले
Share
6 Min Read
SHARE

भारत सरकार ने आगामी जनगणना के साथ-साथ जातिगत जनगणना कराने का निर्णय लिया है। यह फैसला न केवल सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव भी सामने आ सकते हैं। इस लेख में हम जातिगत जनगणना से जुड़ी तमाम परतों को समझने का प्रयास करेंगे। इतिहास, राजनीति, सामाजिक न्याय, महिलाओं का प्रतिनिधित्व, आरक्षण की नई बहस और निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन तक।

भारत में हर 10 साल पर जनगणना होती है, जिसमें धर्म, भाषा, लिंग, शिक्षा आदि आंकड़े एकत्र किए जाते हैं। लेकिन 1931 के बाद से अब तक केंद्र सरकार ने किसी जनगणना में जातिगत आंकड़े नहीं प्रकाशित किए। पिछली जनगणना (2011) में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) तो हुई थी, लेकिन उसमें एकत्रित जातिगत आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया।

जातिगत जनगणना की मांग कई दशक पुरानी है, खासकर ओबीसी और दलित-पिछड़ा संगठनों द्वारा यह तर्क दिया जाता रहा है कि आरक्षण और कल्याण योजनाओं की वास्तविक जरूरतें तभी पूरी होंगी जब वास्तविक आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनें।

पिछले साल सितंबर में इसने जाति जनगणना को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के खिलाफ चेतावनी दी थी, लेकिन कहा था कि सरकार को सभी कल्याणकारी गतिविधियों के लिए आंकड़ों की आवश्यकता है, खासकर उन जातियों और समुदायों को ऊपर उठाने के लिए जो सच में पिछड़े हुए हैं।

भारत का संविधान हर जनगणना के बाद निर्वाचन क्षेत्रों का Delimitation करने की अनुमति देता है, लेकिन 2001 से इसे स्थगित किया गया था। अब जब 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया शुरू होगी, तब जातिगत जनगणना के आंकड़े राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नया रूप देंगे।

यह सवाल उठेगा कि यदि किसी जाति की संख्या ज़्यादा है, तो क्या उसे अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी मिलना चाहिए? इससे वोट बैंक की राजनीति और ज़्यादा केंद्रित और गहन हो सकती है।

हाल ही में पारित महिला आरक्षण विधेयक यानी 128वां संविधान संशोधन में यह स्पष्ट किया गया है कि महिलाओं को आरक्षण तभी मिलेगा जब नई जनगणना और परिसीमन पूरा होगा। ऐसे में जातिगत जनगणना यह भी स्पष्ट कर सकती है कि किस वर्ग की महिलाओं को कितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

क्या यह आरक्षण ओबीसी महिलाओं को मिलेगा? अनुसूचित जाति/जनजाति महिलाओं को मिलेगा? यह तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक उनके सटीक जातिगत आँकड़े न हों।

जातिगत जनगणना से सबसे बड़ा और सीधा प्रभाव पड़ेगा आरक्षण पर। वर्तमान में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिलता है, लेकिन वंचित और अधिक पिछड़ी जातियों की मांग रही है कि उन्हें अलग से उप-वर्गीकरण कर आरक्षण में जगह दी जाए।

उदाहरण के लिए, ओबीसी वर्ग में सैकड़ों जातियाँ आती हैं, लेकिन कुछ ही जातियाँ ज़्यादा लाभ ले पाती हैं। जातिगत आँकड़े यह दिखा सकते हैं कि किन जातियों ने कितना लाभ उठाया और किनको अब तक कुछ नहीं मिला। इससे आरक्षण का पुनर्गठन और वितरण संभव होगा।

जातिगत जनगणना पर राजनीतिक दलों की राय बंटी हुई है। सत्ताधारी भाजपा का रुख अब तक सतर्क रहा है, लेकिन बिहार में एनडीए सहयोगी दलों के दबाव के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर इसे अपनाने की दिशा में बढ़ती दिख रही है। वहीं कांग्रेस, राजद, सपा, जदयू जैसे क्षेत्रीय दल पहले से ही इसकी मांग करते रहे हैं, और इसे सामाजिक न्याय का नया आधार बता रहे हैं।

जातिगत जनगणना की घोषणा चुनावों के पहले अगर होती है, तो यह बड़े स्तर पर वोटों के ध्रुवीकरण का कारण बन सकती है।

जातिगत आंकड़ों के सामने आने से एक ओर जहां नीतियों की सटीकता बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर इससे जातीय अस्मिता भी बढ़ेगी। यह सवाल उठता है कि क्या समाज और ज़्यादा जातिवादी नहीं बन जाएगा? क्या इससे जातियों के बीच की दूरी और अधिक नहीं बढ़ेगी?

कुछ समाजशास्त्री मानते हैं कि सच्चाई को जानना जरूरी है, लेकिन कुछ इसे “Harmonious ideas of modern India” के लिए ख़तरनाक मानते हैं।

जातिगत जनगणना कराना सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक रूप से भी बेहद जटिल है। क्यूंकि कठिनाई ये भी है कि देश में कितनी जातियाँ हैं, इसका कोई पक्का आंकड़ा नहीं है। 1931 की जनगणना में ही लगभग 4,147 जातियाँ दर्ज थीं। नामों की विविधता, एक ही जाति के कई नाम, उपजातियाँ और क्षेत्रीय भिन्नता से आंकड़े एकत्र करना मुश्किल होगा।

जातिगत जनगणना का यह फैसला लोकसभा चुनाव या महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले भी हो सकता था, जब विपक्ष ने जाति जनगणना पर आवाज उठाई थी। घोषणा का आश्चर्य इसकी टाइमिंग है, जो कांग्रेस के मुख्य मुद्दे को पंगु बना देती है और कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार उठाए गए मुद्दे को ही छीनती दिखती है।यह एक सोची-समझी प्रतिक्रिया है, जो बिहार चुनाव से पहले विपक्षी दलों की राजनीति को खत्म कर सकती है।

जातिगत जनगणना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकती है। अच्छा या बुरा ये कह नहीं सकते।

You Might Also Like

सरकार ने महापौर निधि पर लगाई रोक, Nagar Nigam Budget में नहीं होगा प्रावधान

Indore की रंग पंचमी गैर पर इस बार हाईटेक सुरक्षा

Gwalior में हाइवे पर कार को डेढ़ किमी तक घसीटता रहा कंटेनर

Ayatollah Ali Khamenei: इस्लामिक क्रांति से सुप्रीम लीडर तक

Khamenei की मौत के बाद Iran में सत्ता परिवर्तन

TAGGED: bjp, caste census, census 2025, congress, indian politics, OBC, SC ST, social justice, thefourth, thefourthindia
Share This Article
Facebook Twitter Whatsapp Whatsapp LinkedIn
What do you think?
Love0
Sad0
Happy0
Sleepy0
Angry0
Dead0
Wink0

Follow US

Find US on Social Medias

Weekly Newsletter

Subscribe to our newsletter to get our newest articles instantly!

Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
Loading

Popular News

Indore
Cities

Indore के भागीरथपुरा के बाद अब Mhow में गंदा पानी बना बीमारी की वजह

1 महीना पहले

इजराइल को मिली अमेरिका से गोला बारूद और सैनिकों की मदद

इलाहाबाद HC: जाली दस्तावेज़ जमा करने वाली अभ्यर्थी पर NTA कर सकता है कार्यवाही

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने अडानी ग्रुप के मिर्जापुर थर्मल प्लान पर दिखाई चिंता, कहा पर्यावरण को है खतरा !

सूटकेस में बंद सपने: हिमानी नरवाल हत्याकांड ने खड़े किए महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल

You Might Also Like

Holi 2026: 3 मार्च या 4 मार्च, कब मनाई जाएगी रंगों की Holi?
India

Holi 2026: 3 मार्च या 4 मार्च, कब मनाई जाएगी रंगों की Holi?

1 सप्ताह पहले
Dubai में शुरू हो रही है Uber की उड़ने वाली टैक्सी सेवा
World

Dubai में शुरू हो रही है Uber की उड़ने वाली टैक्सी सेवा

1 सप्ताह पहले
बधाई हो! Botswana से आए 9 नए चीते, भारत में अब कुल 48 चीते
Cities

बधाई हो! Botswana से आए 9 नए चीते, भारत में अब कुल 48 चीते

1 सप्ताह पहले
Rewa : वर्दी में वायरल रील ने पुलिस ट्रेनीज़ को दिलाई ‘कारण बताओ’ नोटिस
Cities

Rewa : वर्दी में वायरल रील ने पुलिस ट्रेनीज़ को दिलाई ‘कारण बताओ’ नोटिस

1 सप्ताह पहले
The Fourth
  • About Us
  • Contact
  • Privacy Policy
  • Careers
  • Entertainment
  • Fashion
  • Health
  • Lifestyle
  • Science
  • Sports

Subscribe to our newsletter

Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
Loading
© The Fourth 2024. All Rights Reserved. By PixelDot Studios
  • About Us
  • Contact
  • Privacy Policy
  • Careers
Welcome Back!

Sign in to your account

Lost your password?