‘पापा, मेरा पेपर छूटना नहीं चाहिए…’ अस्पताल के बेड पर लेटी 17 वर्षीय कनिष्का बिष्ट के ये शब्द सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि जज्बे की परिभाषा बन गए। 10 दिन तक बेहोशी, 13 दिन तक आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष, सीने में गंभीर निमोनिया और शरीर से जुड़ी कई मेडिकल मशीनें। इन हालातों के बावजूद कनिष्का का इरादा अडिग रहा।
बचपन से दिव्यांग कनिष्का ने अस्पताल के बिस्तर से ही तय कर लिया था कि वह 12वीं की बोर्ड परीक्षा हर हाल में देगी। शुक्रवार को उसका फिजिक्स का पेपर था। डॉक्टरों ने आराम करने की सलाह दी थी, लेकिन उसने साफ शब्दों में कहा कि उसका साल बर्बाद नहीं होना चाहिए।
अस्पताल से सीधे परीक्षा केंद्र
कनिष्का को व्हीलचेयर पर ऑक्सीजन सपोर्ट और जरूरी मेडिकल उपकरणों के साथ अस्पताल से सीधे परीक्षा केंद्र लाया गया। उसके साथ डॉक्टरों की एक टीम भी मौजूद रही, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत मदद दी जा सके। परीक्षा केंद्र में स्कूल प्रबंधन ने अलग कक्ष और विशेष व्यवस्था की, जिससे वह आराम से पेपर दे सके।
यह दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति के लिए भावुक कर देने वाला था। एक ओर मशीनों से जुड़ी छात्रा, दूसरी ओर आंखों में उम्मीद और आत्मविश्वास। कनिष्का ने साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं।
पिता की आंखें हुईं नम
कनिष्का के पिता प्रेम सिंह ने बताया कि कुछ दिन पहले उसे सामान्य खांसी और जुकाम हुआ था। धीरे धीरे हालत बिगड़ती गई और उसे गंभीर निमोनिया हो गया। स्थिति इतनी नाजुक हो गई कि आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। 10 दिन तक उसे होश नहीं था और 13 दिन तक आईसीयू में जिंदगी की जंग चलती रही।
डॉक्टरों को भी अंदाजा नहीं था कि इतनी गंभीर स्थिति के बाद वह इतनी जल्दी परीक्षा देने का निर्णय ले लेगी। लेकिन कनिष्का ने हिम्मत नहीं हारी।
बीमारी से नहीं, हालातों से भी लड़ाई
17 वर्षीय कनिष्का की यह जंग सिर्फ बीमारी से नहीं, बल्कि परिस्थितियों से भी है। दिव्यांग होने के बावजूद उसने पढ़ाई को कभी बोझ नहीं समझा। मशीनों के सहारे परीक्षा केंद्र तक पहुंचना आसान नहीं था, लेकिन उसने यह कर दिखाया।
उसकी कहानी हर उस छात्र के लिए प्रेरणा है जो छोटी छोटी मुश्किलों में हार मान लेता है। कनिष्का ने दिखा दिया कि हौसलों के आगे मुश्किलें छोटी पड़ जाती हैं और सपनों के आगे बीमारी भी रुकावट नहीं बन सकती।
यह सिर्फ एक परीक्षा नहीं थी, बल्कि जीवन की उस परीक्षा का उत्तर था जिसमें कनिष्का पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी नजर आई।
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