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Reading: Gupta Navratri के पहले दिन से शुरू होती है दशमहाविद्याओं की साधना
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Religion

Gupta Navratri के पहले दिन से शुरू होती है दशमहाविद्याओं की साधना

आज से नौ दिनों तक शक्ति उपासना का विशेष पर्व

Last updated: जुलाई 15, 2026 4:48 अपराह्न
By Divisha 2 महीना पहले
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5 Min Read
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आषाढ़ Gupta Navratri का शुभारंभ आज 15 जुलाई से हो गया है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व शक्ति की आराधना, मंत्र जप, ध्यान और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष महत्व रखता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र की तरह Gupta Navratri में भी मां दुर्गा की पूजा की जाती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता दशमहाविद्याओं की उपासना मानी जाती है। शाक्त परंपरा में यह समय आत्मसाधना और देवी शक्ति की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। देशभर के शक्ति पीठों और देवी मंदिरों में पहले दिन से विशेष पूजा और अनुष्ठान शुरू हो गए हैं। श्रद्धालु कलश स्थापना, व्रत और देवी मंत्रों के जप के साथ नौ दिनों की साधना का संकल्प लेते हैं।

Gupta Navratri के पहले दिन दशमहाविद्याओं की साधना

Gupta Navratri का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष दशमहाविद्याओं की साधना है। शाक्त संप्रदाय में देवी के दस दिव्य स्वरूपों को दशमहाविद्या कहा जाता है। इनमें मां काली, तारा, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक महाविद्या शक्ति के अलग स्वरूप और आध्यात्मिक संदेश का प्रतिनिधित्व करती हैं।

दशमहाविद्याओं में मां काली को प्रथम महाविद्या माना जाता है। उनका स्वरूप समय, शक्ति, साहस और परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। शाक्त ग्रंथों के अनुसार मां काली अज्ञान, भय और अहंकार के विनाश का संदेश देती हैं। Gupta Navratri के पहले दिन कई साधक अपनी गुरु परंपरा के अनुसार मां काली की आराधना से साधना का आरंभ करते हैं। हालांकि धार्मिक विद्वान बताते हैं कि दशमहाविद्याओं की साधना का क्रम सभी परंपराओं में एक जैसा नहीं होता और यह गुरु परंपरा के अनुसार बदल सकता है। इसलिए तांत्रिक साधना केवल योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही की जानी चाहिए।

क्या है दशमहाविद्याओं का रहस्य?

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सनातन परंपरा में दशमहाविद्याओं को केवल देवी के दस रूप नहीं, बल्कि चेतना और शक्ति के दस आयाम माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार भगवान शिव और माता सती के प्रसंग में देवी ने अपने दस विराट स्वरूप प्रकट किए थे, जिन्हें आगे चलकर दशमहाविद्या के रूप में जाना गया। हर महाविद्या जीवन के एक विशेष पक्ष का प्रतिनिधित्व करती है। मां तारा ज्ञान और संरक्षण, त्रिपुर सुंदरी सौंदर्य और परम चेतना, भुवनेश्वरी सृष्टि और व्यापकता, त्रिपुर भैरवी तप और संकल्प, छिन्नमस्ता त्याग और आत्मनियंत्रण, धूमावती वैराग्य, बगलामुखी शत्रु विजय, मातंगी वाणी और कला तथा मां कमला समृद्धि और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।

Gupta Navratri और सामान्य नवरात्र में क्या अंतर है?

चैत्र और शारदीय नवरात्र पूरे देश में बड़े उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं, जबकि Gupta Navratri अपेक्षाकृत शांत और साधना प्रधान माने जाते हैं। इस दौरान सार्वजनिक आयोजनों की तुलना में व्यक्तिगत साधना, मंत्र जप और ध्यान को अधिक महत्व दिया जाता है। Gupta Navratri वर्ष में दो बार माघ और आषाढ़ महीने में आते हैं। शाक्त परंपरा में इन्हें विशेष सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का काल माना गया है, हालांकि सामान्य श्रद्धालु भी इन नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा, व्रत और दुर्गा सप्तशती का पाठ कर सकते हैं।

पहले दिन श्रद्धालु क्या करें?

Gupta Navratri के पहले दिन प्रातः स्नान के बाद शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का पूजन किया जाता है। इसके साथ ही व्रत का संकल्प लिया जाता है और देवी मंत्रों का जप आरंभ किया जाता है। कई श्रद्धालु दुर्गा सप्तशती, देवी कवच और सिद्धकुंजिका स्तोत्र का पाठ भी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन नौ दिनों में सात्विक भोजन, संयमित जीवन, दान और सेवा का विशेष महत्व होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि तांत्रिक अनुष्ठानों का प्रयास स्वयं करने के बजाय योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

आषाढ़ Gupta Navratri का पहला दिन केवल व्रत और पूजा की शुरुआत नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना का भी आरंभ माना जाता है। इसी दिन से दशमहाविद्याओं की उपासना का क्रम प्रारंभ होता है, जो शक्ति के विभिन्न स्वरूपों को समझने और उनके आध्यात्मिक संदेश को आत्मसात करने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि शाक्त परंपरा में Gupta Navratri का पहला दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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