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Reading: रंग, रस और राष्ट्र का आईना…दूरदर्शन, भारत देश के चैनल की 66वीं सालगिरह
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Fourth Special

रंग, रस और राष्ट्र का आईना…दूरदर्शन, भारत देश के चैनल की 66वीं सालगिरह

दूरदर्शन हर घर का सदस्य रहा है

Last updated: सितम्बर 15, 2025 4:17 अपराह्न
By Rajneesh 12 महीना पहले
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5 Min Read
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आज सही मायनों में देश के चैनल ‘दूरदर्शन’ ने अपने 66 वर्ष पूरे कर लिए। इस सफर को कुछ पन्नों में समेटना आसान नहीं है, क्योंकि दूरदर्शन कभी सिर्फ़ एक प्रसारक भर नहीं बल्की हर घर का सदस्य रहा है, जो आँगन और बैठक से लेकर दिलों तक बसा रहा। 15 सितम्बर 1959 को जब इसका आरंभ हुआ, तब से आज तक दूरदर्शन ने इस देश की बदलती धड़कनों, त्योहारों, राजनीति और सपनों को अपने नीले सफ़ेद प्रकाश में दर्ज किया है। आज स्मृतियाँ भले धुंधली पड़ गई हो लेकिन कभी छत पर एंटेना लगाना खुद को चमत्कारी दिखाने का एक मौका हुआ करता था। बच्चे सीढ़ी पर चढ़कर एंटेना घुमाते और नीचे से बड़े – बूढ़ों की आवाज़ आती…बस, रुक जाओ, अब साफ़ आ गया। खर – खराती आवाज़ वाली टीवी में उस धुंधले चित्र का धीरे – धीरे साफ़ होना किसी जादू से कम न था।

जब टेलीविज़न पहली बार भारतीय घरों में पहुँचा, तब दूरदर्शन ही टेलीविज़न था। यह एक उभरते देश का दर्पण था। सावधानी और उम्मीदों से भरा, परंपरा और आधुनिकता का संगम। वह प्रसिद्ध घुमावदार दो मछलियों से आँख जैसा प्रतीक लोगो जब स्क्रीन पर खुलता, तो ऐसा अनुभव होता कि मानो यह देश खुद को ही देख रहा है। ये बच्चों के लिए जादुई संसार की शुरुआत थी और बड़े – बूढ़ों के लिए एक भरोसेमंद सहचर। साठ और सत्तर के दशक में टीवी सेट बहुत दुर्लभ था। पूरा मोहल्ला एक घर की बैठक या आँगन में चारपाई और दरी बिछाकर इकट्ठा होता। बच्चे खिड़की से झाँकते, बड़े ताली बजाते, और सबकी साँसें एक साथ थम जातीं। यह निजी मनोरंजन नहीं बल्कि एक सामूहिक उत्सव हुआ करता था।

दूरदर्शन ने सिर्फ़ कार्यक्रम नहीं दिखाए, बल्कि सांस्कृतिक क्रांतियाँ रच दीं। ‘कृषि दर्शन’ जहां किसानों के लिए जीवन रेखा बन गया। खेत खलिहानों में वैज्ञानिक जानकारी पहली बार पहुँची। वहीं रामायण और महाभारत जब प्रसारित हुए तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता। बसें देर से चलतीं, मंदिरों की भीड़ कम हो जाती और सब टीवी के सामने टकटकी लगाए बैठे रहते।’ हम लोग’ के पात्र, ‘मालगुडी डेज़’ की वो धुन, विभाजन की त्रासदी को नई पीढ़ी के सामने रखने वाला ‘बुनियाद’, ‘चित्रहार’ और ‘रंगोली’ सिर्फ प्रोग्राम नहीं बहुतों के लिए आज उनका अपना इतिहास बन चुका है।

दूरदर्शन सिर्फ़ मनोरंजन नहीं था, यह देश की धड़कनों का दस्तावेज़ था। गणतंत्र दिवस परेड का सीधा प्रसारण लोगों को गर्व से भर देता था। 1983 का क्रिकेट विश्वकप जीतते हुए कपिल देव और उनकी टीम को देखने का रोमांच इसी स्क्रीन से आया। इंदिरा गांधी की हत्या, भोपाल गैस त्रासदी, कारगिल युद्ध…हर कठिन घड़ी में दूरदर्शन ने पूरे देश को एक साथ जोड़कर रखा।

1982 के एशियाई खेलों में जब पहली बार रंगीन प्रसारण हुआ तो मानो सपनों को नए पंख मिल गए। परेड और त्योहार पहले से कहीं अधिक भव्य लगने लगे। फिर नब्बे के दशक में निजी चैनल आए, विज्ञापन और चमक दमक बढ़ी, लेकिन दूरदर्शन अपनी गरिमा पर अडिग रहा। उसने कभी सनसनी का रास्ता नहीं चुना, बल्कि शैक्षिक कार्यक्रमों, क्षेत्रीय भाषाओं के कंटेंट और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से अपनी पहचान बनाए रखी।

आज यह अकेला चैनल नहीं रहा, लेकिन पहला चैनल अब भी है। छह दशकों की ईमानदारी और धैर्य की परंपरा अपने आप में ऐतिहासिक है। दूरदर्शन की कहानी केवल एक चैनल नहीं ब्लकि हमारी कहानी है… हम भारतियों को कहानी। आज केवल चुनिंदा लोग ही शायद उस चैनल को देखते हों लेकिन सुबह “जंगल – जंगल बात चली है” गीत को अधूरा छोड़ स्कूल जाना फिर रात को पेप्सुडेंट प्रेजेंट ‘शक्तिमान’ को देखना हो…सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कल ही की तो बात है।

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TAGGED: 66 years of doordarshan, dd india, dd national, Doordarshan, Indian television, television history, thefourth, thefourthindia
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