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India

क्या 50% की सीमा से आगे बढ़ना चाहिए आरक्षण?

लगभग 90% भारतीय किसी न किसी रूप में ऐतिहासिक वंचित समुदाय से आते हैं

Last updated: सितम्बर 5, 2025 5:12 अपराह्न
By Rajneesh 1 वर्ष पहले
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5 Min Read
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भारत में आरक्षण तथाकथित सामाजिक न्याय को लागू करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। यह व्यवस्था अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) जैसे समुदायों को अवसर देने के लिए बनाई गई। लेकिन आज इसका कई तरह से दुरूपयोग हो रहा है और सच में वंचित लोगों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा।

कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) में यह स्पष्ट किया कि कुल आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए। न्यायालय का तर्क था कि अगर यह सीमा पार होगी तो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत मिले समानता के अधिकार का हनन होगा। लेकिन हाल के वर्षों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्यों ने “विशेष परिस्थितियों” या नई श्रेणियों के आधार पर 50% की सीमा पार करने की कोशिश की।

सवाल उठता है, क्या आरक्षण की सीमा 50% से अधिक होनी चाहिए? अगर हां, तो इसके नतीजे क्या होंगे? और क्या यह दूसरों के साथ अन्याय नहीं होगा?

एक ओर सबके लिए समान अवसर (अनुच्छेद 14, 16), दूसरी ओर कथित ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई (अनुच्छेद 15(4), 16(4))।अगर कोई सीमा न हो, तो आरक्षण अधिकांश जगह भर सकता है और प्रतियोगिता का सिद्धांत खत्म हो सकता है।

लगभग 90% भारतीय किसी न किसी रूप में ऐतिहासिक वंचित समुदाय से आते हैं। अगर बहुसंख्यक ही वंचित हैं, तो आरक्षण का अनुपात भी उनकी संख्या के अनुरूप होना चाहिए।

आरक्षण का विरोध करने वाले मानते हैं कि 50% सीमा तोड़ना अत्यधिक अन्यायपूर्ण होगा क्योंकि फिर तो कोई सीमा ही नहीं रहेगी हर पार्टी हर चुनाव में वोटर को लुभाने के लिए ये सीमा बढ़ाती जायेगी। ऐसे में अगर 70–80 या 90 – 100% सीटें आरक्षित हों जायेंगी, तो सामान्य वर्ग के लिए तो अवसर ही खत्म हो जाएंगे। यानी जिस व्यवस्था को भेदभाव मिटाने के लिए बनाया गया उससे ही भेदभाव होने लगा।

ज़्यादा आरक्षण से प्रतियोगिता और योग्यता का महत्व पहले ही घट रहा है। अवसर देने के नाम पर कम योग्य लोगों का चयन खासकर चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में कितना हानिकारक हो सकता है ये अब किसी से छुपा नहीं है। भारत अगर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना चाहता है, तो केवल आरक्षण आधारित व्यवस्था बाधक होगी।

आरक्षण की मांगें अक्सर वोट-बैंक राजनीति से जुड़ी होती हैं। जैसे महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन और गुजरात में पाटीदार आंदोलन असल में ये आर्थिक संकट से जुड़े थे, लेकिन इन्हें जातिगत आरक्षण में बदल दिया गया।

अगर हर राज्य अलग-अलग 70–80% तक आरक्षण लागू करेगा, तो पूरे देश में असमानता और टकराव पैदा होगा। इससे जातीय पहचान खत्म होने की बजाये और गहरी होगी।

आरक्षण बढ़ाने के बजाय सरकार को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक अवसर पर निवेश करना चाहिए। स्थायी समाधान विकास है, न कि अंतहीन कोटा।

अगर आरक्षण 50% से आगे गया तो क्या होगा?

सीधे तौर पर समाज में ध्रुवीकरण बढ़ेगा। सामान्य वर्ग का युवा असंतोष में सड़क पर उतर सकता है, जैसा मंडल आयोग (1990) के समय हुआ था। हर बार आरक्षण सीमा तोड़े जाने पर याचिकाएं दायर होंगी और व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी। नागरिक पहले “जाति” के आधार पर सोचेंगे, फिर “भारतीय” होने पर। सामान्य वर्ग के प्रतिभाशाली युवा सरकारी नौकरियां छोड़कर निजी या विदेशी क्षेत्र में जाएंगे।

देश को दक्षता की जरूरत है, लेकिन अत्यधिक आरक्षण व्यवस्था संस्थानों की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा को कमजोर ही करेगी।

आरक्षण 50% से अधिक होना चाहिए या नहीं यह न्याय और समानता, इतिहास और भविष्य, पहचान और योग्यता के बीच संतुलन का प्रश्न है।हां, ऐतिहासिक अन्याय वास्तविक हैं और जाति अब भी भारत में सामाजिक ढांचे को प्रभावित करती है। इसलिए आरक्षण को समाप्त करना नैतिक या व्यावहारिक नहीं होगा। लेकिन, सीमा तोड़कर आरक्षण बढ़ाना नए अन्याय और विभाजन को जन्म देगा।

इसलिए, सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण को 50% सीमा से आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। यह कोई “दैवी नियम” नहीं, लेकिन यह संतुलन का सुरक्षित उपाय है। सीमा तोड़ने से भारत नए अन्याय और विभाजन की ओर बढ़ सकता है।

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TAGGED: Indra Sawhney case, reservation in India, SC ST OBC, social justice, Supreme Court, thefourth, thefourthindia
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