आज ही के दिन यानी 19 सितम्बर 1893 को न्यूज़ीलैंड ने इतिहास में अपना नाम हमेसा के लिए दर्ज करा दिया। यह वह दिन था जब न्यूज़ीलैंड दुनिया का पहला देश बना जिसने महिलाओं को राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने का अधिकार दिया। यह सुधार अचानक नहीं हुआ था बल्कि दशकों के संघर्ष, निरंतर अभियान और उन विचारधाराओं की देन था जो पारंपरिक सत्ता और नागरिकता की परिभाषाओं को चुनौती दे रही थीं।
19वीं सदी के अधिकांश हिस्से में दुनिया की महिलाएँ राजनीतिक अधिकारों से वंचित थीं। राजनीति पूरी तरह पुरुषों के नियंत्रण में थी और कानून महिलाओं को आश्रित मानता था, मानो वे स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय लेने में अक्षम हों। लेकिन जैसे ही लोकतांत्रिक संस्थाएँ ब्रिटिश उपनिवेशों और अन्य हिस्सों में फैलने लगीं, महिलाओं ने इस बहिष्कार के विरुद्ध आवाज़ तेज़ कर दी।
न्यूज़ीलैंड, जो उस समय का अपेक्षाकृत नया लोकतंत्र था, वहाँ आंदोलन को मजबूत आधार मिला। महिलाओं की क्रिश्चियन टेम्परेंस यूनियन यानी WCTU ने मतदान अधिकार को स्वास्थ्य, शिक्षा और नैतिक सुधारों से जोड़ा। उनका तर्क था कि यदि महिलाएँ वोट कर सकें तो समाज में शराबखोरी जैसी बुराइयाँ कम होंगी, परिवार कल्याण को बढ़ावा मिलेगा और समाज की नैतिकता मजबूत होगी।
इस आंदोलन की अगुवाई ‘केट शेपर्ड’ ने की। उन्होंने और उनकी साथी कार्यकर्ताओं ने देश के इतिहास की सबसे बड़ी याचिका संगठित की। 1893 में उनकी याचिका पर लगभग 32 हजार महिलाओं के हस्ताक्षर थे। जब इसे संसद के सामने रखा गया तो यह एक विशाल स्क्रॉल की तरह फैला दिया गया, जो बदलाव की जनता की मांग का ठोस प्रमाण था।
न्यूज़ीलैंड की संसद में महिलाओं के मताधिकार पर वर्षों से बहस होती रही थी। लेकिन 1893 की इस याचिका ने सबका ध्यान खींच लिया। संसद में तीखी बहस हुई। विरोधी पक्ष का तर्क था कि राजनीति महिलाओं को गिरा देगी और यह व्यवस्था के लिए घातक होगी। इसके बावजूद विधेयक पास हो गया।
19 सितम्बर 1893 को गवर्नर लॉर्ड ग्लासगो ने इलेक्टोरल एक्ट 1893 पर हस्ताक्षर किए और न्यूज़ीलैंड की महिलाओं को संसदीय चुनावों में मतदान का अधिकार मिल गया। यह कदम उस समय के लिए अभूतपूर्व था। न्यूज़ीलैंड की महिलाएँ उन बड़े और पुराने लोकतंत्रों से भी पहले राजनीतिक आवाज़ पा गईं जो स्वयं को लोकतांत्रिक आदर्श मानते थे।
इस निर्णय का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ा। ब्रिटिश साम्राज्य के किनारे स्थित एक छोटे से देश ने दुनिया को दिखा दिया कि यह अधिकार पाना संभव है। उसी साल नवंबर में जब न्यूज़ीलैंड में आम चुनाव हुए तो लगभग 65 प्रतिशत योग्य महिलाओं ने मतदान किया। यह इतना अधिक था कि आलोचकों की बात झूठी साबित हो गई कि महिलाएँ वोट डालने में रुचि नहीं लेंगी।
इसके बाद धीरे-धीरे दूसरे देशों ने भी कदम उठाए।
ऑस्ट्रेलिया ने 1902 में महिलाओं को मतदान का अधिकार दिया, हालांकि तब इसमें आदिवासी महिलाओं को शामिल नहीं किया गया। फिनलैंड ने 1906 में यह अधिकार दिया।
अमेरिका में महिलाओं को यह अधिकार 1920 में मिला जब संविधान का 19वाँ संशोधन पारित हुआ। खुद ब्रिटेन ने (जिसके साम्राज्य का न्यूज़ीलैंड हिस्सा था) महिलाओं को बराबरी के मतदान अधिकार 1928 में दिया। यह समय अंतराल बताता है कि 1893 में न्यूज़ीलैंड का कदम कितना क्रांतिकारी था।
न्यूज़ीलैंड की यह उपलब्धि केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि महिलाओं को वोट मिला, बल्कि इसलिए भी कि इसने साबित किया कि जड़ जमाए हुए ढाँचे भी बदले जा सकते हैं। इसने दुनिया को बताया कि राजनीतिक समानता कोई सपना नहीं बल्कि वास्तविकता है। यह लोकतंत्र का मूल सिद्धांत भी स्थापित करता है कि नागरिकता तभी न्यायपूर्ण है जब वह समावेशी हो।
आज केट शेपर्ड की तस्वीर न्यूज़ीलैंड के दस डॉलर के नोट पर है। हर साल 19 सितम्बर को न्यूज़ीलैंड इस ऐतिहासिक उपलब्धि को याद करता है। इसे केवल एक राष्ट्रीय जीत नहीं बल्कि वैश्विक परिवर्तन की शुरुआत माना जाता है।
यह भी एक सच है कि न्यूज़ीलैंड, जो एक छोटा और भौगोलिक रूप से दूरस्थ देश था, उसने बड़ी शक्तियों से पहले यह कदम उठाया। 1893 में महिलाओं को मताधिकार देकर न्यूज़ीलैंड ने केवल अपनी राजनीति नहीं बदली, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक इतिहास की दिशा बदल दी।
