Mahoba। तकनीक की बैसाखी से नकली साज छेड़ने वालों की भीड़ में महोबा के युवाओं की टोली आल्हा गायन के लिए निकली है। सहारा तो इन्होंने भी माइक, की-बोर्ड और नए साज का लिया है, लेकिन गायन शैली से छेड़छाड़ नहीं होने दी है। बुंदेलखंड में आठ आल्हा गा रहे हैं। वीर-रस की इस गायन विधा को फिर जिंदा किया जाए।
चकाचौंध में इसे खोने नहीं देंगे।
सदस्य जितेंद्र चौरसिया बता रहे हैं कि बुंदेलखंड के लोक-संगीत और भाषा ने ही पहचान दी। चकाचौंध में इसे खोने नहीं देंगे। हम पुराना हुलिया, पुराने साज-बाज से नई धुन छेड़ रहे हैं। तीन साल से जारी है। ऐसा समय देखा है कि नई पीढ़ी तो चलते कार्यक्रम से उठकर चली जाती थी। न तो समझ आता था और न ही वे जानने की कोशिश करते हैं। अब युवाओं को पसंद आ रहा है।
गांव में वीरता की कहानियां
बुंदेलखंड से गूंजे स्वर को देशभर में सराहा गया। आज भी गांव में वीरता की कहानियां सुनाई जाती हैं। पहले सिर्फ ढोलक की थाप पर गाया जाता था। अब कई साज हैं। जितेंद्र और उनकी टीम को बीते डेढ़-दो साल से पहचान मिल गई है। वीर-रस गाते हैं, तो लोग जोश से भर जाते हैं। गुजर-बसर के लिये काम भी करते हैं, लेकिन शाम के बाद आल्हा गायन ही जिंदगी है।
