MP में जब भी महिला सशक्तीकरण की बात होती है तो छियासी और पनिहारी की चर्चा नहीं होती। ये वो दो बहने हैं जिन्होंने अपनी मेहनत से अपना नाम अमर कर दिया। इन बहनों के कामों को जानने के लिए आपको रामगढ़ जाना होगा। … जरा ठहरिए, यह अमिताभ बच्चन की फिल्म शोले वाला रामगढ़ नहीं है। मध्य प्रदेश के रामगढ़ जिले में पंचायत है माचलपुर। इसे मालवा का हिमाचलपुर कहा जाता है। लेकिन बोली में नाम बिगड़ता गया। ‘हि’ गायब हो गया और अब सिर्फ माचलपुर बचा है। हिमाचलपुर नाम क्यों पड़ा इसकी भी अपनी कहानी है। मान्यता है कि यहां माता पार्वती का जन्म हुआ और यहीं पर उनकी भगवान शंकर से शादी भी हुई थी। हालांकि इसके कोई धार्मिक दस्तावेज तो नहीं हैं, लेकिन यहां भगवान शिव और माता पार्वती का प्राचीन मंदिर जरूर है। फिर भावनाओं को प्रमाणों की जरूरत भी कहां होती है। स्थानीय लोगों की मान्यताएं बहुत मजबूत हैं।

मां पार्वती की तरह ही यहां की दो बेटियां छियासी और पनिहारी भी हैं, जिन्हें लोगों ने देखा भी है। इसलिए इनके प्रमाणों की जरूरत नहीं है, लेकिन प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं होती। होलकर शासनकाल के दौरान माचलपुर में छियासी और पनिहारी नाम की दो बहनें रहती थीं। दोनों बहुत मेहनती थी और साधारण काम करके अपना जीवन चलाती थी।

पनिहारी का काम कुएं और बावड़ियों से पानी भरना था, जबकि छनियारी पहाड़ियों पर उपले बीनने का काम करती थी। दोनों बहनों की इच्छा थी कि उनका नाम हमेशा लोगों की यादों में बना रहे। अपनी मेहनत की कमाई से उन्होंने देवरा बल्डी दो सुन्दर पत्थर की इमारत बनवाई। बाद में ये स्मारक उनके नाम से प्रसिद्ध हो गए और आज भी छियासी और पनिहारी स्तूप के नाम से जाने जाते हैं। आज ये स्तूप माचलपुर की पहचान बन चुके हैं। ये ना केवल यहाँ की कहानी बताते हैं, बल्कि उस दौर की कला और संस्कृति भी दर्शाते हैं। छियासी और पनिहारी स्तूप बस पत्थरों से बने स्मारक नहीं हैं। बल्कि माचलपुर के इतिहास की एक खास निशानी हैं। ये याद दिलाते हैं कि दो सामान्य सी महिलाओं ने कैसे अपनी मेहनत से स्वयं को अमर कर लिया।
