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Reading: आज की तारीख – 31: 3 दिसंबर…भारतीय इतिहास में विशेष महत्व का दिन
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Fourth Special

आज की तारीख – 31: 3 दिसंबर…भारतीय इतिहास में विशेष महत्व का दिन

3 दिसंबर ने देश के राजनीतिक, सामाजिक इतिहास में गहरा प्रभाव छोड़ा है। चाहे वह स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस का जन्म हो या भोपाल गैस त्रासदी की पीड़ा।

Last updated: दिसम्बर 3, 2024 3:32 अपराह्न
By Rajneesh 2 वर्ष पहले
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8 Min Read
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भारत का इतिहास कई अहम तारीखों से भरा हुआ है, और 3 दिसंबर उनमें से एक है। इस दिन ने देश के राजनीतिक, सामाजिक और वैज्ञानिक इतिहास में गहरा प्रभाव छोड़ा है। चाहे वह स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस और पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म हो या भोपाल गैस त्रासदी और इमर्जेंसी की पीड़ा हो। इस तारीख से जुड़े कुछ मुख्य घटनाक्रमों को विस्तार से समझते हैं।

1889 : स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस का जन्म!

आजादी की लड़ाई में फांसी पर चढ़ने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस का जन्म आज की तारीख यानी 03 दिसंबर को हुआ था। वो बंगाल के मिदनापुर(हबीबपुर) मे पैदा हुए थे। बताया जाता है कि उनके जन्म से पहले दो भाइयों की बीमारी के कारण मौत हो गई थी। ऐसे में उनकी जान बचाने के लिए टोटका अपनाया। इस टोटके में बड़ी बहन ने चावल के बदले उनको खरीद लिया। बंगाल में चावल को खुदी कहा जाता था, यही वजह रही कि उस बच्चे का नाम खुदीराम बोस पड़ गया। देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले खुदीराम बोस हाथ में गीता लिए बेखौफ फंदे पर झूल गए थे।

दरअसल 18 अप्रैल 1908 को खुदीराम और उनका एक साथी मुजफ्फरपुर के जज किंग्सफोर्ड को मारने के लिए निकले। दोनों ने मिलकर तय किया कि जब किंग्सफोर्ड बग्घी से वापस आएगा, तब वह बम फेंककर उसको मार देंगे। योजना के अनुसार दोनों ने काम किया, लेकिन जज की जान बच गई। दरअसल, जिस बग्घी पर उन्होंने बम फेंका था उस पर दो महिलाएं सवार थीं। जिनमें से एक महिला की मौत हो गई।

इस घटना के कारण 01 मई 1908 को खुदीराम को गिरफ्तार कर लिया गया और हत्या का मुकदमा चलाया गया। बिना किसी भय के खुदीराम ने यह कुबूला कि उन्होंने बम फेंका था। जिसके बाद 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को मुजफ्फरपुर जेल में फांसी की सजा दी गई थी।

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1884 : डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्मदिन

”मंजिल को पाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए याद रहे कि मंजिल की ओर बढ़ता रास्ता भी उतना ही नेक हो।” – डॉ. राजेंद्र प्रसाद

भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की आज जन्म जयंती है। 3 दिसंबर 1884 को बिहार के जीरादेई में उनका जन्म हुआ था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति तो थे ही, वह लगातार दो बार राष्ट्रपति रहे थे। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से जुड़े रहे और संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे अपने जीवनभर ईमानदारी और सादगी के लिए जाने जाते रहे। उनका योगदान आज भी भारतीय राजनीति और समाज के लिए प्रेरणादायक है।

Rajendra Prasad Indian President signed image for Walter Nash NZ Prime Minister 1958 16017609534.jpg - The Fourth

1971 : देश मे दूसरी बार आपातकाल लगा

जब देश या किसी राज्य पर अकाल, बाहरी देशों के आक्रमण या आंतरिक प्रशासनिक अव्यवस्था या अस्थितरता आदि जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए, तो उस समय उस क्षेत्र की सभी राजनैतिक और प्रशासनिक शक्तियां राष्ट्रपति के हाथों में चली जाती हैं। इसे आपातकाल या इमरजेंसी कहा जाता है। भारत में अब तक तीन बार आपातकाल लग चुका है।

दूसरी बार इमरजेंसी 3 दिसंबर 1971 को लगाई गई थी। यह वह वक्त था जब भारत-पाकिस्तान युद्ध चल रहा था। इस वक्त भी देश की सुरक्षा को खतरा देखते हुए आपात काल की घोषणा की गई थी। उस समय वी. वी. गिरी देश के राष्ट्रपति थे। यह आपातकाल 17 दिसंबर तक जारी था।

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1979 : हॉकी के जादूगर ने दुनिया को कहा अलविदा

हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की आज यानी 3 दिसंबर को 45वीं पुण्यतिथि है। 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद मे जन्मे ध्यानचंद जैसा हॉकी खिलाड़ी आज तक दुनिया में पैदा ही नहीं हुआ। उन्होंने तीन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। तीनों ही बार ओलंपिक में भारतीय टीम ने गोल्ड मेडल जीता था।

उनका असली नाम ध्यान सिंह था। सेना में भर्ती होने के दौरान वो रात में चांद की रोशनी में प्रैक्टिस किया करते थे। इसलिए उनके साथी खिलाड़ियों ने उनके नाम के आगे चंद लगा दिया और उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया।

जर्मनी के तानाशाह हिटलर भी ध्यानचंद के खेल के मुरीद थे। बर्लिन ओलंपिक के दौरान हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी सेना में सबसे ऊंचे पद का ऑफर दिया था। लेकिन ध्यानचंद ने इसे ठुकरा दिया था।

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1984 : भोपाल गैस त्रासदी

1984 में 2 दिसंबर और 3 दिसंबर की मध्यरात्रि भोपाल वालों के लिए दुनिया की सबसे स्याह काली रात थी। 40 साल बीत गए, लेकिन भोपाल गैस त्रासदी वाली रात को याद कर लोग अब भी सिहर जाते हैं। भारत के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है।

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस का रिसाव हुआ। इस घटना में हजारों लोगों की मौत हुई, और लाखों लोग आज भी इसके परिणाम भुगत रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों की मानें तो भोपाल गैस त्रासदी में मरने वालों की संख्या 3,787 थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट में यह संख्या 15,724 से ज्यादा बताई गई है। जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मरने वालों की संख्या 33 हजार से ज्यादा थी। यह दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी थी।

जहरीली गैस लीक होने से हजारों की संख्या में मरने वालों की खबर फैली, तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री थे। जब जहरीली गैस के रिसाव और लोगों के मरने की जानकारी अर्जुन सिंह को मिली तो वे तुरंत परिवार को लेकर सरकारी विमान से इलाहाबाद चले गए। वे जनता को मरता छोड़ अपनी और अपने परिवार की जान बचाने के लिए भाग गए।

भोपाल गैस कांड के समय मुख्य आरोपी एंडरसन को भोपाल से सुरक्षित निकाल दिल्‍ली और फिर अमेरिका भेज दिया गया। वो फिर कभी वापस नहीं आया। एंडरसन को तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह के आदेश पर छोड़ा गया था।

यूनियन कार्बाइड के सात अधिकारियों को दो साल की मामूली जेल की सजा सुनाई और जुर्माना लगाया। दोषी जुर्माना भरकर 14 दिन बाद ही जमानत पर रिहा हो गए। यानी भोपाल के दोषियों ने ज्यादा से ज्यादा 14 दिन ही जेल में काटे। जबकि हजारों पीड़ितों की कानूनी लड़ाई अब भी जारी है।

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विश्व विकलांग दिवस

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1992 में 3 दिसंबर को विश्व विकलांग दिवस घोषित किया गया। यह दिन विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देने और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए समर्पित है।

भारत जैसे देश में जहां विकलांग व्यक्तियों की संख्या अधिक है, यह दिन उनकी चुनौतियों को उजागर करने और उन्हें समर्थन देने के लिए महत्वपूर्ण है।

हाल के वर्षों में भारत में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए शिक्षा, रोजगार और परिवहन के क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं।

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