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Fourth Special

आज की तारीख – 4: ‘अंत्योदय’ के प्रेरक पंडितजी की जयंती!

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर को 'अंत्योदय दिवस' के रूप मे मनाई जाती है।

Last updated: सितम्बर 25, 2024 3:07 अपराह्न
By Rajneesh 2 वर्ष पहले
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6 Min Read
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“नैतिकता के सिद्धांत किसी के द्वारा बनाए नहीं जाते, बल्कि खोजे जाते हैं।” — पंडित दीनदयाल उपाध्याय

आज भारतीय राजनीति के एक ऐसे अद्भुत व्यक्ती का जन्म हुआ था जिनका योगदान आज भी समाज, धर्म और राष्ट्र के निर्माण में गहराई से महसूस किया जाता है। वह केवल एक विचारक, संगठनकर्ता, और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रेरक थे। उनके जीवन के अर्थशास्त्र को महत्व दिया गया और उन्हें आधुनिक भारत के संदर्भ में प्रस्तुत करने के लिए समर्पित किया गया। भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती 25 सितंबर को ‘अंत्योदय दिवस’ के रूप मे मनाई जाती है। अंत्योदय का अर्थ है “अंतिम व्यक्ति का उदय”, मतलब समाज के सबसे गरीब और पिछड़े व्यक्ति का उत्थान।

पंडित उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को मथुरा जिले के नगला चन्द्रभान गाँव में हुआ था। उनके पिता, भगवती प्रसाद उपाध्याय, एक ज्योतिषी थे और माता, रामप्यारी, एक धार्मिक महिला थीं। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया, और जीवन ने उन्हें समय से पहले ही आत्मनिर्भर बना दिया। उनकी शिक्षा राजस्थान के विद्यार्थियों में हुई, जहाँ उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा में ही मेधावी विद्यार्थी का ख़िताब प्राप्त किया। उनके जीवन के आरंभिक दौर से ही समाज और राष्ट्र के प्रति एक गहरी संवेदना और समर्पण का भाव था।

उन्होंने हिंदू समाज की शक्ति को विकसित करने और उसे एकजुट करने का कार्य किया। उनका मानना ​​था कि हिंदू धर्म केवल पूजा पद्धति नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पूर्ण प्रणाली है। उन्होंने ‘अखंड भारत’ का सपना देखा, जिसमें भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक मसालों को शामिल किया गया।

पंडित दीनदयाल का जीवन सादगी और संयम का अद्वितीय उदाहरण था। वे बहुत ही साधारण जीवन जीते थे, और उनका निजी जीवन हमेशा अनुशासित रहा। कहा जाता है कि उनके पास कपड़ों का एक छोटा सा बैग हुआ करता था, जिसमें वे पूरा सामान रखते थे। वे कितने ईमानदार थे इसे एक किस्से से समझा जा सकता है। एक बार की बात है, आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर और पंडित जी एक ही रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे। गुरु जी यानी माधवराव जी प्रथम श्रेणी डिब्बे में थे जबकि पं. दीनदयाल उपाध्यय जी तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। एक स्टेशन पर गुरु जी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय को संदेश भिजवाया, ‘कुछ मुद्दों पर महत्वपूर्ण बात करनी है। पंडित जी डिब्बे से उतरकर गुरु जी के पास पहुंचे। गाड़ी चल दी। बातचीत पूरी करने के बाद दीनदयाल जी एक स्टेशन पर उतरकर अपने डिब्बे में आ गए और टिकट चेकर की तलाश शुरू कर दी। मिला तो पूरी बात बताकर बोले, ‘फला से फला स्टेशन तक प्रथम और तृतीय श्रेणी के किराए में अंतर का किराया भुगतान करना है। टिकट चेकर ने यह कहकर, ‘अरे! जाने दें, ऐसा तो होता ही रहता है। पंडित जी ने कहा देखो रेलवे राष्ट्रीय सम्पत्ति है, उसकी हानि राष्ट्रीय क्षति है।’

भारतीय जनसंघ की स्थापना में पंडित उपाध्याय ने निभाई अहम भूमिका। जनसंघ को उन्होंने केवल एक राजनीतिक दल के रूप में नहीं, बल्कि एक इकाई इकाई के रूप में देखा, जो राष्ट्र को एक नई दिशा देने के लिए कार्य करना चाहता था। 1967 में वे जनसंघ के अध्यक्ष बने और उनके नेतृत्व में जनसंघ की राजनीतिक वृद्धि हुई। उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नए आयाम को जोड़ा, जिसमें राष्ट्र और राष्ट्र निर्माण के साथ सामाजिक समता और सांस्कृतिक पुनर्जीवन भी शामिल है।

पंडित जी की मौत भी रहस्यमयी रही। 11 फरवरी 1968 को मुगल मुगल सराय रेलवे स्टेशन पर उनका शव ट्रैक पर मिला। यह घटना आज भी एक रहस्य बनी हुई है। कहा जाता है कि वे कई लोगों के लिए एक चुनौती बन गए थे। कई राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना ​​है कि उनकी हत्या एक गहरी साजिश थी, लेकिन आज तक इसका कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है। उनकी मृत्यु भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ी क्षति थी, और इसके बाद जनसंघ को भी एक बड़ा झटका लगा।

पंडित जी का जीवन और उनके विचार आज भी समाज और राजनीति में प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। उन्होंने भारतीय समाज के लिए जो अलग-अलग प्रस्तुति दी, वह न केवल अपने समय में त्याग थे, बल्कि आज भी महत्वपूर्ण हैं। उनका जीवन हमें यही सिखाता है कि समाज और देश के विकास के लिए केवल आर्थिक दृष्टिकोण नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण की भी आवश्यकता है।

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