इंदौर: ऐतिहासिक राजवाड़ा एक बार फिर शाही परंपराओं का साक्षी बना, जब मल्हारी मार्तंड मंदिर में भव्य समारोह के बीच Holkar Rajvansh के नए उत्तराधिकारी की घोषणा की गई। पूरे विधि-विधान और राजसी वातावरण में यशवंतराव होलकर तृतीय को 16वें उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित किया गया।
दरबार में सरदारों, दीवानों, राजगुरु और अन्य पारंपरिक पदाधिकारियों की मौजूदगी ने आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप दे दिया। यह निर्णय होलकर परिवार की वरिष्ठ सदस्य उषा देवी की इच्छा के अनुसार लिया गया, जिन्होंने अपने छोटे भाई शिवाजीराव होलकर द्वितीय के पुत्र यशवंतराव को इस जिम्मेदारी के लिए चुना। समारोह के दौरान उन्हें पारंपरिक पगड़ी पहनाई गई और पूर्व शासक यशवंतराव होलकर द्वितीय की तलवार सौंपकर उत्तराधिकार की परंपरा को आगे बढ़ाया गया। साथ ही ‘बहादुर’ की उपाधि भी औपचारिक रूप से प्रदान की गई, जो अब उनके नाम के साथ जुड़ गई है।
कुलदेवता के आशीर्वाद से शुरू हुई नई जिम्मेदारी
उत्तराधिकारी बनने के बाद यशवंतराव ने सबसे पहले कुलदेवता मल्हारी मार्तंड के दर्शन किए। इसके बाद अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा के समक्ष पान-सुपारी अर्पित कर श्रद्धांजलि दी पूजा-अर्चना के पश्चात उनके पिता शिवाजीराव होलकर द्वितीय ने औपचारिक घोषणा करते हुए उन्हें परिवार की तलवार भेंट की। इस पूरे आयोजन का संचालन राजगुरु डॉ. विजय विश्वनाथ राजोपाध्याय ने किया, जिन्होंने ग्रहशांति के साथ राम नवमी का विशेष पूजन भी संपन्न कराया।
अनुष्ठान के बाद पूर्व इंदौर रियासत की परंपरा के अनुसार दरबार आयोजित हुआ, जिसमें फणसे, बार्गल, पलशीकर और फडनीस जैसे प्रमुख परिवारों की उपस्थिति रही। सरदार फणसे ने नए उत्तराधिकारी को राजसी वस्त्र भेंट किए और उन्हें खासगी ट्रस्ट की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।
सेवा, संस्कृति और विरासत को आगे बढ़ाने का लक्ष्य
अपनी नई भूमिका को स्वीकार करते हुए यशवंतराव होलकर तृतीय ने इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल पद नहीं बल्कि जिम्मेदारी है, जिसे वे पूरी निष्ठा से निभाएंगे।
उन्होंने बताया कि बदलते समय के साथ राजपरिवार की भूमिका भी विकसित हो रही है। इसी दिशा में वे Holkar Rajvansh सांस्कृतिक केंद्र के माध्यम से विरासत संरक्षण, रेवा सोसाइटी और वुमनवीव के जरिए हथकरघा क्षेत्र को मजबूत करने और खासगी ट्रस्ट के माध्यम से सामाजिक व धार्मिक सेवा कार्यों को आगे बढ़ाने पर ध्यान देंगे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उत्तराधिकार की परंपरा
Holkar Rajvansh की स्थापना मल्हारराव होलकर ने 18वीं सदी में की थी। इसके बाद कई शासकों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
Holkar Rajvansh परिवार के शासक व शासनकाल
1. सूबेदार मल्हारराव होलकर: 1731-66
2. मालेराव होलकर: 1766-67
3. अहिल्याबाई होलकर: 1767-95
4. तुकोजीराव होलकर: 1795-97
5. काशीराव होलकर: 1797-99
6. यशवंतराव होलकर (प्रथम): 1799-1811
7. मल्हारराव होलकर (द्वितीय): 1811-33
8. मार्तंडराव होलकर: 1833-34
9. हरिराव होलकर: 1834-43
10. खंडेराव होलकर: 1843-44
11. तुकोजीराव होलकर (द्वितीय): 1844-56
12. शिवाजीराव होलकर: 1856-1903
13. तुकोजीराव होलकर (तृतीय): 1903-26
14. यशवंतराव होलकर (द्वितीय): 1926-48
15. महारानी उषाराजे होलकर: 1962
परिवारिक पृष्ठभूमि
यशवंतराव होलकर द्वितीय की तीन पत्नियां थीं—संयोगिताराजे, मार्गरेट लावर और युफेमिया वाट। संयोगिताराजे की पुत्री उषाराजे हैं, जबकि युफेमिया वाट के पुत्र रिचर्ड यानी शिवाजीराव होलकर द्वितीय हैं। भारतीय रानी की संतान होने के कारण पहले उषाराजे को गद्दी सौंपी गई थी। बाद में शिवाजीराव का विवाह पद्मश्री सम्मानित शालिनी देवी से हुआ और उनके पुत्र यशवंतराव को अब नया उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। वर्तमान में यशवंतराव होलकर तृतीय महेश्वर और मुंबई में निवास करते हैं।
आज भी निभाई जा रही परंपराएं
Holkar Rajvansh आज भी कई पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का निर्वहन कर रहा है। इनमें राजवाड़ा पर होली दहन, दशहरा पर शमी पूजन, गणेश चतुर्थी पर पालकी में गणेश स्थापना और हरिराव होलकर की छत्री में विसर्जन प्रमुख हैं। महेश्वर में प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन और विसर्जन की परंपरा भी जारी है। इसके अलावा गुड़ी पड़वा और चंपा षष्ठी जैसे पर्व भी विशेष रूप से मनाए जाते हैं। खासगी ट्रस्ट आज भी मंदिरों में पूजा और भोग की व्यवस्था संभाल रहा है।
समारोह की खास बातें
सुबह 8:30 बजे शुरू हुआ यह आयोजन दोपहर 1:30 बजे तक चला। कुलदेवता के दर्शन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई। राजगुरु द्वारा पगड़ी पहनाने की रस्म निभाई गई। पिता द्वारा तलवार भेंट कर उत्तराधिकार सौंपा गया। सरदार फणसे ने राजसी वस्त्र अर्पित किए। ‘बहादुर’ की उपाधि नाम के साथ जोड़ी गई।
यह आयोजन न केवल एक औपचारिक उत्तराधिकार था, बल्कि Holkar Rajvansh की जीवित परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक जिम्मेदारियों के निरंतर प्रवाह का प्रतीक भी बना।
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