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Reading: कौन हैं हिन्दुस्तानी ‘दोबरी महाराजा’? जो यहूदियों के लिये पूरे विश्व से भीड़ गये। पोलैंड मे आज भी किया जाता है याद?
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कौन हैं हिन्दुस्तानी ‘दोबरी महाराजा’? जो यहूदियों के लिये पूरे विश्व से भीड़ गये। पोलैंड मे आज भी किया जाता है याद?

आज हम उनकी बात इसलिए कर रहे हैं, क्यूंकि, हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पोलैंड के दौरे पर थे।

Last updated: अगस्त 23, 2024 1:43 अपराह्न
By Rajneesh 2 वर्ष पहले
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6 Min Read
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जाम साहिब दिग्विजयसिंहजी रंजीतसिंहजी जाडेजा, जितना बड़ा नाम उससे भी ज्यादा विशालकाय और उदारता वाला व्यक्तित्व। उन्हे “नवानगर के महाराजा” के रूप में भी जाना जाता है, वे भारत के उन महान शासकों में से एक थे, जिन्होंने अपने दयालु और उदार हृदय से इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी। आज हम उनकी बात इसलिए कर रहे हैं, क्यूंकि, हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पोलैंड के दौरे पर थे। पोलैंड यात्रा के दौरान पीएम वॉरसॉ स्थित ‘जाम साहेब दिग्विजयसिंहजी रंजीतसिंहजी जडेजा मेमोरियल’ पर भी पहुंचे थे। यहां उन्होंने ‘रंजीतसिंहजी जडेजा’ को श्रद्धांजलि अर्पित की। लेकिन सवाल उठता है कि, आखिर पोलैंड मे एक भारतीय राजा की स्मृति मे ये जगह क्यूं बनाई गई और वहां उनका इतना सम्मान क्यूँ होता है।

इस किस्से का एक शीरा जुड़ा है दूसरे वर्ल्ड वॉर से…1939 का समय यूरोप में बेहद जटिल था। शक्तिशाली देश एक-दूसरे के खिलाफ अपनी चालें चल रहे थे। इसी समय, 23 अगस्त 1939 को, सोवियत संघ और नाजी जर्मनी के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ जिसे ‘मोलोटोव-रिबेंट्रॉप’ पैक्ट कहा जाता है। यह समझौता एक गैर-आक्रमण संधि थी, जिसमें दोनों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध न करने का वादा किया।इस समझौते के तहत एक गुप्त प्रोटोकॉल भी था, जिसमें पूर्वी यूरोप के देशों को दोनों शक्तियों के बीच विभाजित करने की योजना बनाई गई थी। पोलैंड, जो उस समय एक स्वतंत्र देश था, इस योजना का पहला शिकार बना। 1 सितंबर 1939 को, जर्मनी ने पोलैंड पर आक्रमण कर दिया, जो दूसरे वर्ल्ड वॉर की शुरुआत का संकेत था।

17 सितंबर 1939 को, सोवियत संघ ने भी अपनी तरफ से पोलैंड पर हमला किया, जैसा कि मोलोटोव-रिबेंट्रॉप समझौते में तय हुआ था। पोलैंड दो शक्तियों के बीच विभाजित हो गया; पश्चिमी हिस्सा जर्मनी के कब्जे में और पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ के कब्जे में चला गया।

इन आक्रमणों के दौरान, यहूदियों पर अत्याचार की कहानी भी सामने आई। नाजी जर्मनी ने अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में यहूदियों के खिलाफ भयंकर अभियान शुरू किया। पोलैंड में लाखों यहूदी रहते थे, और उन पर अत्याचारों की शुरुआत जल्द ही हो गई। उन्हें उनके घरों से बेदखल कर यहूदी बस्तियों में बंद कर दिया गया, जहां वे अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर थे। बाद में, इन यहूदियों को यातना शिविरों में भेजा गया, जहां उनकी बड़ी संख्या में हत्या कर दी गई। इस त्रासदी को इतिहास में ‘होलोकॉस्ट’ के नाम से जाना जाता है।

दूसरी ओर, सोवियत संघ ने भी अपने कब्जे वाले क्षेत्रों में अत्याचार किए। लोगों को दंडित किया जो इसका विरोध करते थे। मोलोटोव-रिबेंट्रॉप समझौता इतिहास के उन काले अध्यायों में से एक है, जिसने न केवल पोलैंड को विभाजित किया, बल्कि यहूदियों और अन्य निर्दोष लोगों पर असंख्य अत्याचार भी किए। दूसरे वर्ल्ड वॉर में इस समझौते का प्रभाव बहुत गहरा था, जिसने यूरोप के नक्शे को बदल दिया और लाखों लोगों की जान ले ली।

कट टू इंडिया, आजादी से पहले गुजरात में कच्छ क्षेत्र मे एक सल्तनत हुआ करती थी, नाम था नवांनगर जो अब का जामनगर कहलाता है। यहां जडेजा राजपूतों का शासन था। साल 1895 में राजा दिग्विजयसिंहजी का जन्म हुआ। लंदन में पढ़ाई के बाद वे 1919 में ब्रिटिश आर्मी में कमीशन हो गए। वर्ल्ड वॉर II शुरू होने के बाद उन्हें इम्पीरियल वॉर कैबिनेट का हिस्सा बनाया गया। कैबिनेट का हिस्सा रहते हुए महाराजा दिग्विजयसिंह को पोलिश रेफ्यूजियों की हालत का पता चला, जो बेघर हो कर हर तरफ भटक रहे थे। इन बच्चों का जीवन अंधकार में डूबा हुआ था, और उनके पास कहीं भी जाने का कोई ठिकाना नहीं था। इस कठिन समय में, जाम साहिब दिग्विजयसिंहजी ने एक असाधारण कदम उठाया। उन्होंने लगभग 1000 पोलिश बच्चों को अपने राज्य नवानगर में शरण दी। यह कदम न केवल उनकी अद्वितीय उदारता का प्रतीक था, बल्कि मानवता के प्रति उनके असीम प्रेम का भी उदाहरण था। जाम साहिब ने इन बच्चों के लिए एक विशेष शिविर का निर्माण किया, जिसे “बालचड़ी” के नाम से जाना गया। यहाँ इन बच्चों को न केवल भोजन और सुरक्षा दी गई, बल्कि उनकी शिक्षा और सांस्कृतिक विकास की भी व्यवस्था की गई। जाम साहिब ने इन बच्चों को अपने परिवार का हिस्सा माना और उनके प्रति पिता जैसा व्यवहार किया। पोलैंड के लोग आज भी जाम साहिब को सम्मान और श्रद्धा से याद करते हैं। 2007 में, पोलैंड सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया। उनके इस महान कार्य के कारण, उन्हें “पोलिश बच्चों का संरक्षक” कहा जाता है।

ब्रिटिश सरकार पोलिश रेफ्यूजियों के भारत आने को लेकर खुश नहीं थी। उनका भी कारण वही था। वो अपने सहयोगी स्टालिन को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसके साथ साथ कई देश भी भारत के इस रवैये से नाराज़ हो गये… लेकिन महाराजा उन सभी से भीड़ गये और अपने सिद्धांत पर अडिग रहे। इसके साथ ही भारत वो पहला देश बना जिसने पोलिश रेफ्यूजियों को अपने यहां न सिर्फ शरण दी ब्लकि उनका ख़ास ध्यान भी रखा। पोलैंड मे लोग महाराजा दिग्विजयसिंहजी को ‘दोबरी महाराजा’ कहकर भी याद करते हैं। महाराजा दिग्विजयसिंहजी पर पूरे भारत को गर्व होना चाहिये और उनके किस्सों को हर स्कूल मे भी पढ़ाना चाहिए।

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