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Reading: Momos की लत ने 10 साल की बच्ची को पहुंचाया ICU: Plasmapheresis से बची जान
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Momos की लत ने 10 साल की बच्ची को पहुंचाया ICU: Plasmapheresis से बची जान

फास्ट फूड और खराब लाइफस्टाइल बच्चों के लिवर के लिए बन रहे खामोश खतरे

Last updated: अप्रैल 18, 2026 2:55 अपराह्न
By Divisha 6 महीना पहले
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7 Min Read
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नई दिल्ली से सामने आया एक चौंकाने वाला मामला यह बताता है कि बच्चों की खानपान की आदतें किस तरह उनकी सेहत पर गंभीर असर डाल सकती हैं। बुराड़ी इलाके में रहने वाली 10 वर्षीय बच्ची तान्या माथुर को अचानक याददाश्त कमजोर होने, चलने-फिरने में दिक्कत और मानसिक सुस्ती की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

परिजनों के मुताबिक, शुरुआत में तान्या छोटी-छोटी बातें भूलने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि उसे खड़े होने में भी परेशानी होने लगी। स्थिति गंभीर होने पर उसे यथार्थ अस्पताल, मॉडल टाउन में भर्ती कराया गया। जांच में पता चला कि बच्ची का लिवर लगभग फेल हो चुका था और शरीर में विषाक्त पदार्थों के फैलाव से उसके दिमाग पर भी असर पड़ चुका था। हालत इतनी गंभीर थी कि उसे आईसीयू में भर्ती करना पड़ा।

डॉक्टरों के मुताबिक, इस गंभीर स्थिति के पीछे मुख्य कारण था लगातार फास्ट फूड का सेवन, खासकर Momos और पैकेज्ड स्नैक्स। समय रहते Plasmapheresis जैसी उन्नत चिकित्सा प्रक्रिया से बच्ची की जान बचा ली गई।

कैसे बिगड़ी हालत: छोटी आदत बनी बड़ी बीमारी

बच्ची की मां सावित्री माथुर ने बताया कि वे और उनके पति दोनों नौकरी करते हैं, जिसके कारण तान्या दिनभर घर पर अपने दादा के साथ रहती थी। इसी दौरान वह अक्सर दादा से पैसे लेकर बाहर से मोमोज, चिप्स और अन्य फास्ट फूड खरीदकर खाती थी।

शुरुआत में हल्की भूलने की आदत दिखी, जिसे परिवार ने सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन कुछ ही दिनों में उसकी स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। बच्ची को खड़ा होने में भी दिक्कत होने लगी और वह सामान्य गतिविधियां करने में असमर्थ हो गई। जब उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, तो जांच में सामने आया कि उसका लिवर गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका है। डॉक्टरों ने बताया कि लिवर के सही से काम न करने के कारण शरीर में टॉक्सिन्स जमा हो गए, जिससे दिमाग में सूजन यानी हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी की स्थिति बन गई।

लिवर फेलियर और दिमाग पर असर: कितना खतरनाक है यह?

लिवर शरीर का एक बेहद महत्वपूर्ण अंग है, जो खून को साफ करने, पाचन में मदद करने और विषैले तत्वों को बाहर निकालने का काम करता है। जब लिवर सही तरीके से काम नहीं करता, तो शरीर में अमोनिया जैसे जहरीले पदार्थ बढ़ने लगते हैं। इन विषाक्त तत्वों का असर सीधे दिमाग पर पड़ता है, जिससे भ्रम, याददाश्त कमजोर होना, व्यवहार में बदलाव और गंभीर मामलों में बेहोशी तक हो सकती है। बच्चों में यह स्थिति और भी खतरनाक होती है क्योंकि उनका शरीर विकासशील अवस्था में होता है।

क्या है Plasmapheresis: कैसे बची बच्ची की जान?

डॉक्टरों ने पहले बच्ची के लिए लिवर ट्रांसप्लांट की संभावना जताई थी, लेकिन बाद में Plasmapheresis प्रक्रिया अपनाई गई, जिससे उसकी जान बच गई।

Plasmapheresis एक उन्नत चिकित्सा तकनीक है, जिसमें मरीज के खून से विषैले तत्वों को हटाकर शुद्ध प्लाज्मा शरीर में डाला जाता है। इस प्रक्रिया से शरीर में जमा टॉक्सिन्स कम हो जाते हैं और लिवर को रिकवर होने का समय मिल जाता है। डॉक्टरों के अनुसार, बच्ची को दो यूनिट प्लाज्मा चढ़ाया गया, जिसके बाद उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ और वह खतरे से बाहर आ गई।

बढ़ता खतरा: बच्चों में फैटी लिवर के मामले चिंताजनक

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। आजकल बच्चों में फैटी लिवर के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है। अनुमान के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में करीब 30 से 35 प्रतिशत बच्चों में फैटी लिवर के शुरुआती लक्षण देखे जा रहे हैं।

इसके पीछे मुख्य कारण हैं:

•फास्ट फूड और जंक फूड का अधिक सेवन

•मोबाइल और स्क्रीन टाइम में बढ़ोतरी

•शारीरिक गतिविधियों की कमी

•असंतुलित दिनचर्या

फैटी लिवर शुरू में एक साधारण समस्या लगती है, लेकिन समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह लिवर फेलियर तक पहुंच सकती है।

कम पानी पीना भी बन रहा बड़ा कारण

डॉक्टरों ने एक और महत्वपूर्ण बात बताई कि आजकल बच्चे और बड़े दोनों ही पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पी रहे हैं। जहां एक स्वस्थ व्यक्ति को दिनभर में कम से कम 2.5 लीटर पानी पीना चाहिए, वहीं अधिकतर लोग केवल 1 से 1.5 लीटर पानी ही पी रहे हैं। कम पानी पीने से शरीर का मेटाबोलिज्म धीमा हो जाता है और विषैले तत्व शरीर में जमा होने लगते हैं, जिससे लिवर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

फास्ट फूड का असर: स्वाद से ज्यादा नुकसान

मौजूदा समय में मोमोज, बर्गर, पिज्जा और पैकेज्ड स्नैक्स बच्चों की पहली पसंद बन चुके हैं। ये खाद्य पदार्थ स्वादिष्ट जरूर होते हैं, लेकिन इनमें:

•अत्यधिक तेल

•नमक और मसाले

•प्रिजर्वेटिव्स

•खराब गुणवत्ता का मैदा

जैसे तत्व होते हैं, जो लंबे समय में शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। खासतौर पर सड़क किनारे मिलने वाले फास्ट फूड में साफ-सफाई और गुणवत्ता को लेकर भी सवाल होते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।

माता-पिता की भूमिका: लापरवाही पड़ सकती है भारी

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चों की खानपान की आदतों पर कितना ध्यान दिया जा रहा है। कामकाजी माता-पिता के लिए यह चुनौती जरूर है, लेकिन बच्चों की डाइट और लाइफस्टाइल को नजरअंदाज करना गंभीर परिणाम दे सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि-

•बच्चों को घर का बना ताजा भोजन दिया जाए

•जंक फूड का सेवन सीमित किया जाए

•रोजाना शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा दिया जाए

•पर्याप्त पानी पीने की आदत डाली जाए

समय रहते सावधानी ही बचाव

यह मामला एक चेतावनी है कि छोटी-छोटी आदतें भी बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं। यदि बच्चा बार-बार थकान, कमजोरी, याददाश्त में कमी या व्यवहार में बदलाव दिखाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और सही इलाज से गंभीर बीमारियों को रोका जा सकता है। साथ ही, स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर बच्चों को ऐसे खतरों से दूर रखा जा सकता है।

https://www.instagram.com/p/DXQ2Gijk6FT/?igsh=MWh6cWlhN3Q0bDg0Yw==

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