‘‘Pahalgam से पहला फोन मुझे ही आया था… ऑस्टिन रो रहा था। बोला कि पापा को गोली मार दी है। मुझे समझ नहीं आया, फिर दोबारा पूछा, तो आतंकी हमले का पता चला। पांचवीं से साथ पढ़ते हैं… रोज मिलते हैं, बात होती है, लेकिन मैंने आज तक नहीं पूछा कि उस दिन सब कैसे हुआ।’’ ये कहना है, Pahalgam हमले में घायल (पिता को खोने वाले) ऑस्टिन नाथनियाल के दोस्त साहिल हार्डिया का। ऑस्टिन की दुनिया छोटी-सी है… तीन-चार दोस्त हैं। उनमें साहिल और मयंक सबसे करीब हैं। मयंक का कहना है कि वो पहले ही चुप रहता था, अब और खामोश हो गया है। दु:ख तो है ही… पछतावा भी है कि काश, मैं उस दिन हत्यारों से भिड़ जाता।
बेटे ने कहा खुद को व्यस्त रखते हैं
वीणा नगर में घर के सामने से गुजरने वाली संकरी सडक़ पर ट्रैफिक की चिल्ला-पुकार भी उस घर के सन्नाटे को नहीं तोड़ पाई है, जिसने साल भर पहले बैसरन घाटी में कत्लेआम झेला था। ऑस्टिन बात करने को तैयार नहीं थे। पड़ोसी के बुलाने पर बाहर आए… पत्रकार कुछ पूछें, उससे पहले बोले कि ‘‘आपको तो अपनी नौकरी करना है… हमारा भी तो सोचो।’’ जैसे-तैसे घर में बुलाने और बात करने को राजी हुए। हर सवाल के जवाब में कभी शब्द कम पड़ जाते हैं, तो कभी आवाज अटक जाती है। यही दोहराते हैं कि खुद को व्यस्त रखते हैं, ताकि दर्द भुला सकें। बहन आकांक्षा के पैर पर लगी गोली के घाव न तो बदन से गए हैं और न ही जेहन से। मां जेनिफर काली यादों में कैद हैं… कमरे से बाहर नहीं निकलती हैं। इन मां-बहन का सहारा बेटा ही है, जो इंग्लैंड जाकर पढऩा चाहता था।
घर की लगभग हर दीवार पर पिता की फोटो
ऑस्टिन, जेनिफर और आकांक्षा यही दिखाने की कोशिश करते हैं कि सब ठीक है। घर की लगभग हर दीवार पर पिता सुनील नाथनियाल की तस्वीरें हैं। मुखिया होने के बावजूद बच्चे जैसी चहल-पहल रखते थे। रौनक उन्हीं से थी। अब ऐसा सन्नाटा है कि घड़ी की आवाज भी सुनाई देती है।
महाराष्ट्र सहित दूसरे राज्यों की सरकारों ने Pahalgam हमले के परिवारों को मदद दी है। महाराष्ट्र में तो 50 लाख रुपए तक दिए, लेकिन मध्यप्रदेश में सिर्फ बातें हुईं। परिवार ने कभी मांगा भी कुछ नहीं। स्वाभिमान सिखा कर गए हैं पिता… हाथ नहीं फैलाना चाहते। ऑस्टिन को अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।
