अफगानिस्तान में Taliban शासन के तहत लागू किए गए नए दंड संहिता कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नए प्रावधानों में यह कहा गया है कि यदि पति द्वारा पत्नी पर की गई मारपीट से हड्डी नहीं टूटती और खुला घाव नहीं होता तो इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस प्रावधान ने महिलाओं की सुरक्षा और मानवाधिकारों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या है नए कानून का प्रावधान
रिपोर्ट्स के मुताबिक Taliban नेतृत्व ने एक संशोधित आपराधिक संहिता लागू की है जिसमें घरेलू मामलों में शारीरिक अनुशासन को कुछ हद तक स्वीकार्य माना गया है। कानून की व्याख्या के अनुसार यदि मारपीट से स्थायी या स्पष्ट गंभीर शारीरिक क्षति नहीं होती तो उस पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
यदि पीड़िता को हड्डी टूटने या खुले घाव जैसी चोटें आती हैं तो सीमित अवधि की सजा का प्रावधान है। हालांकि अधिकतम सजा को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने सवाल उठाए हैं क्योंकि इसे बहुत हल्का माना जा रहा है।
महिलाओं के अधिकारों पर प्रभाव
साल 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद से महिलाओं के अधिकारों पर लगातार पाबंदियां बढ़ी हैं। लड़कियों की माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर प्रतिबंध लगाया गया। कई क्षेत्रों में महिलाओं के काम करने पर रोक लगाई गई। सार्वजनिक स्थानों पर उनकी आवाजाही भी सीमित की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि नया कानून पहले से मौजूद महिला संरक्षण कानूनों को कमजोर करता है। पूर्व सरकार के समय लागू किया गया एलिमिनेशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमेन कानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा देता था, लेकिन वर्तमान ढांचे में उसकी प्रभावशीलता लगभग समाप्त मानी जा रही है।
कानूनी प्रक्रिया में चुनौतियां
मानवाधिकार समूहों के अनुसार पीड़ित महिला को न्याय पाने के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। अदालत में शिकायत दर्ज कराना, चिकित्सकीय प्रमाण प्रस्तुत करना और सामाजिक दबाव झेलना आसान नहीं है। ग्रामीण इलाकों में न्यायिक व्यवस्था तक पहुंच और भी कठिन है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि घरेलू हिंसा केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं होती। मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न भी गंभीर समस्या है, लेकिन नए कानून में इन पहलुओं का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इससे पीड़ितों की कानूनी सुरक्षा सीमित हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इन प्रावधानों पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह कदम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों और लैंगिक समानता के अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत है। कुछ देशों ने अफगानिस्तान में मानवाधिकारों की स्थिति पर पुनर्विचार की मांग की है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार के कानून सामाजिक संरचना को और अधिक पितृसत्तात्मक बना सकते हैं। इससे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि की आशंका भी जताई जा रही है।
सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ
Taliban प्रशासन का कहना है कि उनकी नीतियां इस्लामी कानून की व्याख्या पर आधारित हैं। हालांकि कई इस्लामी विद्वानों ने भी इस व्याख्या पर असहमति जताई है और कहा है कि किसी भी परिस्थिति में महिलाओं के साथ हिंसा को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता।
अफगानिस्तान की वर्तमान आर्थिक और सामाजिक स्थिति भी जटिल है। बेरोजगारी, गरीबी और मानवीय संकट के बीच महिलाओं की स्थिति और कमजोर हुई है। ऐसे में कानूनी संरक्षण का कमजोर होना उनके लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकता है।
आगे क्या
विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और आंतरिक सामाजिक विमर्श आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि नागरिक समाज और वैश्विक समुदाय मिलकर आवाज उठाते हैं तो कानून में संशोधन की संभावना बन सकती है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि नए प्रावधानों ने घरेलू हिंसा को लेकर कानूनी मानकों में बदलाव किया है, जिससे महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। आने वाले समय में इस कानून के प्रभाव और इसके सामाजिक परिणामों पर वैश्विक नजर बनी रहेगी।
