Gwalior में भारतीय जनता पार्टी के भीतर एक बार फिर गुटीय राजनीति खुलकर सामने आ गई है। इस बार विवाद का केंद्र Gwalior रेलवे स्टेशन का नामकरण बन गया है। करीब 550 करोड़ रुपए की लागत से स्टेशन का आधुनिक रूप तैयार किया गया है और अब इसके नाम को लेकर अलग अलग राजनीतिक गुट आमने सामने आ गए हैं। यह मुद्दा केवल नामकरण तक सीमित नहीं है बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राजनीतिक प्रभाव की लड़ाई भी माना जा रहा है।
लोकसभा में उठी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम की मांग
Gwalior से सांसद भारत सिंह कुशवाह ने लोकसभा में स्टेशन का नाम देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखने की मांग की है। उन्होंने इसे जनभावना से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कहा कि अटल जी का Gwalior से गहरा नाता रहा है और उनके नाम पर स्टेशन का नामकरण क्षेत्र के लिए गौरव की बात होगी। संसद में इस प्रस्ताव को लेकर तालियां भी बजीं जिससे यह स्पष्ट हुआ कि इस मांग को राजनीतिक समर्थन भी मिल रहा है। भारत सिंह कुशवाह को विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का करीबी माना जाता है, जिससे यह मांग सीधे तौर पर तोमर गुट की रणनीति के रूप में देखी जा रही है।

Scindia समर्थकों की अलग राय
दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री Jyotiraditya Scindia के समर्थक स्टेशन का नाम उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री Madhav Rao Scindia के नाम पर रखने की मांग कर रहे हैं। Madhav Rao Scindia का Gwalior राजघराने से संबंध रहा है और क्षेत्र में उनकी मजबूत राजनीतिक पहचान रही है। Scindia समर्थकों का तर्क है कि माधवराव सिंधिया ने Gwalior और Chambal क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया था, इसलिए स्टेशन का नाम उनके नाम पर होना चाहिए। इंटरनेट मीडिया पर भी इस मांग को लेकर सक्रियता देखी जा रही है और समर्थक खुलकर अपने पक्ष में माहौल बना रहे हैं।
Gwalior Chambal में पुरानी गुटबाजी फिर उभरी
Gwalior चंबल अंचल में ज्योतिरादित्य Scindia और नरेंद्र सिंह तोमर के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कोई नई बात नहीं है। दोनों नेता भले ही एक ही पार्टी में हों लेकिन क्षेत्रीय राजनीति में अलग अलग शक्ति केंद्र के रूप में देखे जाते हैं। कई मौकों पर दोनों गुटों के नेताओं के बीच दूरी साफ नजर आई है। हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में हुए कार्यक्रमों में भी यह खींचतान दिखी। घाटीगांव में आयोजित लाड़ली बहना योजना के राज्य स्तरीय सम्मेलन में तोमर गुट के प्रमुख नेता शामिल नहीं हुए जबकि कुलैथ में आयोजित कार्यक्रमों से Scindia समर्थकों ने दूरी बनाई।
सामाजिक संगठनों की भी एंट्री
इस विवाद में अब सामाजिक संगठनों की भी एंट्री हो गई है। स्थानीय क्षत्रिय समाज ने इंटरनेट मीडिया के जरिए Gwalior के ऐतिहासिक शासक महाराजा मानसिंह के नाम को आगे बढ़ाया है। उनका कहना है कि Gwalior की पहचान उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है, इसलिए नामकरण उसी के अनुरूप होना चाहिए। इस तरह अब यह मुद्दा केवल दो राजनीतिक गुटों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि इसमें सामाजिक और ऐतिहासिक भावनाएं भी जुड़ गई हैं।
नामकरण से ज्यादा प्रतिष्ठा की लड़ाई
Gwalior रेलवे स्टेशन के नामकरण को लेकर चल रही यह बहस केवल एक औपचारिक निर्णय नहीं है। इसके पीछे क्षेत्रीय राजनीति में प्रभाव स्थापित करने की कोशिश भी छिपी हुई है। भाजपा के भीतर इस तरह की गुटीय खींचतान आगामी चुनावों के लिहाज से भी अहम मानी जा रही है। Gwalior Chambal क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है और यहां नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखना पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में स्टेशन के नामकरण का फैसला किसके पक्ष में जाता है, यह आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय कर सकता है।
https://www.instagram.com/reel/DWDo2jpCCOu/?igsh=MTV6aXJuczd0dGQweg==
