Kailash Mansarovar यात्रा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, लेकिन इस बार वजह धार्मिक नहीं बल्कि कूटनीतिक है। भारत द्वारा लिपुलेख पास के जरिए यात्रा को आगे बढ़ाने के फैसले पर नेपाल ने आपत्ति जताई है। नेपाल का कहना है कि यह क्षेत्र उसके अधिकार क्षेत्र में आता है, जबकि भारत इसे अपना पारंपरिक मार्ग बताता है। इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-नेपाल संबंधों में एक बार फिर संवेदनशीलता बढ़ा दी है।
क्या है पूरा मामला?
लिपुलेख पास उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पास स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है, जो भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के ट्राइजंक्शन के करीब पड़ता है। यह दर्रा Kailash Mansarovar यात्रा के लिए सबसे छोटा और सुगम मार्ग माना जाता है। भारत कई वर्षों से इस मार्ग का उपयोग करता रहा है और 2020 में यहां सड़क निर्माण के बाद इस रास्ते को और सुविधाजनक बना दिया गया। इसी फैसले के बाद नेपाल ने पहली बार खुलकर आपत्ति दर्ज कराई थी और अब 2026 में यात्रा शुरू होने के साथ ही उसने फिर से विरोध जताया है।
नेपाल का क्या है दावा?
नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा क्षेत्र उसके पश्चिमी हिस्से में आते हैं। इसके लिए नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला देता है, जिसमें महाकाली नदी को दोनों देशों की सीमा माना गया था। नेपाल के अनुसार महाकाली नदी का वास्तविक स्रोत लिंपियाधुरा में है, जिससे पूरा विवादित क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आता है। नेपाल ने इस मुद्दे को लेकर भारत और चीन दोनों को कूटनीतिक नोट भी भेजा है और बिना उसकी सहमति के किसी भी गतिविधि पर आपत्ति जताई है।
भारत का क्या है पक्ष?
भारत का स्पष्ट रुख है कि लिपुलेख पास उसके प्रशासन और नियंत्रण में है और यह क्षेत्र वर्षों से भारतीय गतिविधियों का हिस्सा रहा है। भारत के अनुसार यह मार्ग 1954 से Kailash Mansarovar यात्रा के लिए पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत ने नेपाल के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि सीमा का निर्धारण ऐतिहासिक तथ्यों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर होता है, और इस मामले में भारत की स्थिति मजबूत है।
क्यों महत्वपूर्ण है लिपुलेख पास?
- लिपुलेख पास केवल एक दर्रा नहीं, बल्कि रणनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।
- यह Kailash Mansarovar यात्रा का सबसे छोटा रास्ता है
- भारतीय सेना के लिए यह एक अहम रणनीतिक बिंदु है
- यह भारत-चीन सीमा के पास स्थित होने के कारण संवेदनशील क्षेत्र है
इसी वजह से इस क्षेत्र को लेकर कोई भी बयान या कदम दोनों देशों के संबंधों पर सीधा असर डालता है।
Kailash Mansarovar यात्रा का महत्व
Kailash Mansarovar यात्रा हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत को भगवान शिव का निवास माना जाता है और मानसरोवर झील को आध्यात्मिक शुद्धता का प्रतीक। हर साल हजारों श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल होते हैं। कोविड महामारी के दौरान यह यात्रा कुछ समय के लिए बंद रही, लेकिन अब इसे फिर से शुरू किया गया है।
2020 से शुरू हुआ तनाव
लिपुलेख पास को लेकर विवाद नया नहीं है, लेकिन 2020 में भारत द्वारा सड़क निर्माण के बाद यह मुद्दा ज्यादा उभरकर सामने आया। नेपाल ने उस समय अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया था। इस कदम से दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ गया था, हालांकि बाद में कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिश की गई।

नेपाल ने क्यों भेजा डिप्लोमैटिक नोट?
हाल ही में Kailash Mansarovar यात्रा के फिर से शुरू होने के बाद नेपाल ने भारत और चीन को डिप्लोमैटिक नोट भेजकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल का कहना है कि बिना उसकी सहमति के इस मार्ग का उपयोग करना उसकी संप्रभुता के खिलाफ है। वहीं भारत ने इस पर कोई आक्रामक प्रतिक्रिया नहीं दी है और इसे पारंपरिक व्यवस्था बताया है।
क्या बातचीत से निकलेगा समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल बातचीत और आपसी समझ से ही सुलझ सकता है। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध मजबूत रहे हैं, इसलिए दोनों देश इस विवाद को बढ़ाने से बचना चाहते हैं। दोनों पक्षों ने पहले भी सीमा विवाद पर बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही है और उम्मीद की जा रही है कि आगे भी यही रास्ता अपनाया जाएगा।
भारत-नेपाल संबंधों पर असर
भारत और नेपाल के संबंध हमेशा से गहरे और बहुआयामी रहे हैं। खुली सीमा, सांस्कृतिक समानता और धार्मिक जुड़ाव दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब लाते हैं।
हालांकि इस तरह के सीमा से जुड़े मुद्दे समय-समय पर संबंधों में तनाव पैदा करते हैं। फिर भी दोनों देश इन्हें बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करते रहे हैं। Kailash Mansarovar यात्रा से जुड़ा लिपुलेख पास मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल की आपत्ति और भारत के जवाब ने इसे कूटनीतिक स्तर पर अहम बना दिया है। हालांकि यह विवाद नया नहीं है, लेकिन हर बार यह दोनों देशों के संबंधों की संवेदनशीलता को उजागर करता है।
