Tiger – स्टेट का तमगा अब सिरदर्द साबित हो रहा है। बाघों की बढ़ती आबादी… संभाल नहीं पा रहे हैं। कहीं आपसी झगड़े हैं, तो कहीं शिकार के कारण tiger की मौत हो रही है। सडक़ पर टक्कर और खेत किनारे लगी करंट वाली बागड़ भी जान ले रही है। आंकड़े बता रहे हैं कि देश में बाघ की तादाद 65 फीसद (2014-2022) बढ़ी। मध्यप्रदेश में यही रफ्तार 155 फीसद की है। देश में 2226 बाघ थे, जो 3682 हो गए। मध्यप्रदेश में आंकड़ा 308 से 785 हो गया।
2014 से 2019 के बीच 224 को मार डाला।
Tiger ने जान भी ली है। 2014 से 2019 के बीच 224 को मार डाला। उसके अगले छह साल में 87 फीसद केस बढ़ गए। म.प्र. की रफ्तार इससे भी ज्यादा है। वाइल्ड लाइफ अधिकारी मिलिंद परविकम ने कहा कि घटते जंगल, बदलती आबोहवा से जानवर को परेशानी हो रही है। जितने इंतजाम थे, वो बढ़ती आबादी के कारण नाकाफी हैं। एक और अधिकारी धर्मेंद्र खंडाल कह रहे हैं कि रखरखाव वाले लोग भी लापरवाही कर रहे हैं। यह हाल सिर्फ मध्यप्रदेश नहीं, झारखंड, ओडिशा और यूपी में भी है।
खामी छुपा रहा वन विभाग
एक्टिविस्ट अजय दुबे कह रहे हैं कि हालात उतने नहीं बिगड़े हैं, जितने वन विभाग वाले बताते हैं। खामी छिपाने के लिए सब बातें हो रही हैं। लोग, लकड़ी और तेंदूपत्ता जैसी चीजों के लिए जंगल में जाते हैं… और बाघ का शिकार हो जाते हैं।
